प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अदालत के आदेश का पालन नहीं होने पर सख्त रुख अपनाया है। एक मामले में आरोपी को हाईकोर्ट के समक्ष पेश नहीं किए जाने पर नाराजगी जताते हुए अदालत ने मेरठ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को करीब 45 मिनट तक कोर्ट रूम में खड़ा रखा। साथ ही, भविष्य में ऐसी लापरवाही नहीं होने की हिदायत दी। अदालत ने मामले में लापरवाही को लेकर मेरठ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के खिलाफ भी प्रशासनिक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने दुष्कर्म के एक मामले में पीड़िता की ओर से दाखिल जमानत निरस्तीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।

आरोपी को पेश नहीं करने पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने निचली अदालत और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि यह चौंकाने वाला मामला है, जिसमें हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद आरोपी को उसके सामने पेश नहीं किया गया।

अदालत के मुताबिक, आरोपी को पेश करने के लिए गैर-जमानती वारंट जारी किया गया था। इसके बावजूद आरोपी को हाईकोर्ट में पेश करने के बजाय मेरठ की अदालत ने उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया।

हाईकोर्ट ने इस घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी और न्यायिक आदेशों के अनुपालन पर सवाल उठाए।

SSP की दलील हाईकोर्ट ने की खारिज

सुनवाई के दौरान मेरठ के एसएसपी ने अपनी सफाई में कहा कि आरोपी को हाईकोर्ट के समक्ष इसलिए पेश नहीं किया जा सका, क्योंकि उनके अधीनस्थ अधिकारी ने उसे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर दिया था। इसके बाद सीजेएम ने आरोपी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने एसएसपी की इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि गैर-जमानती वारंट की तामील स्वयं एसएसपी ने कराई थी, इसलिए आरोपी को हर हाल में हाईकोर्ट के समक्ष पेश करना सुनिश्चित करना उनकी जिम्मेदारी थी। केवल अधीनस्थ अधिकारी या निचली अदालत की कार्रवाई का हवाला देकर इस जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।

CJM के खिलाफ भी प्रशासनिक कार्रवाई के निर्देश

हाईकोर्ट ने मामले में मेरठ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी गंभीर आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट के समक्ष आरोपी को पेश करने के निर्देश की जानकारी होने के बावजूद उसे न्यायिक हिरासत में भेजना गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।

इसी आधार पर अदालत ने संबंधित सीजेएम के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई करने के निर्देश दिए।

न्यायिक आदेशों की अनदेखी पर सख्त संदेश

इस मामले में हाईकोर्ट की सख्ती को न्यायिक आदेशों के अनुपालन और अधिकारियों की जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि न्यायालय के आदेशों का पालन सुनिश्चित करना संबंधित अधिकारियों का दायित्व है और इसमें लापरवाही को सामान्य प्रशासनिक चूक मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

फिलहाल, इस मामले में हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी और अधिकारियों के खिलाफ दिए गए निर्देश न्यायिक व्यवस्था में जवाबदेही के महत्व को रेखांकित करते हैं।