वाराणसी। भारतीय सनातन संस्कृति में वर्ष भर आने वाले पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाले आध्यात्मिक अवसर भी हैं। इन्हीं में से एक है गुप्त नवरात्रि, जिसे तंत्र, मंत्र, ध्यान और देवी उपासना का अत्यंत प्रभावशाली काल माना जाता है। यह नौ दिवसीय साधना पर्व व्यक्ति को बाहरी संसार की चकाचौंध से हटाकर स्वयं के अंतर्मन से जोड़ने का संदेश देता है। इस अवसर पर सिद्ध संत एवं आध्यात्मिक गुरु डॉ. सचिन्द्र नाथ महाराज ने गुप्त नवरात्रि के महत्व, इसकी साधना पद्धति तथा जीवन में इसके प्रभाव पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि गुप्त नवरात्रि केवल देवी पूजन का धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मबल, मानसिक स्थिरता और आध्यात्मिक जागरण का ऐसा काल है, जिसमें साधक स्वयं के भीतर छिपी दिव्य शक्तियों को पहचानने का प्रयास करता है। यदि इस अवधि में श्रद्धा, अनुशासन और सात्त्विकता के साथ साधना की जाए तो व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन स्वतः दिखाई देने लगते हैं।
आडंबर नहीं, आत्मा की आवाज सुनने का अवसर
डॉ. सचिन्द्र नाथ महाराज ने कहा कि आज के समय में अधिकांश लोग धार्मिक आयोजनों को केवल उत्सव के रूप में देखते हैं, जबकि गुप्त नवरात्रि का स्वरूप इससे बिल्कुल अलग है। यह पर्व व्यक्ति को मौन रहने, आत्मविश्लेषण करने और अपने विचारों को शुद्ध बनाने की प्रेरणा देता है। इस दौरान किया गया प्रत्येक जप, ध्यान और तप साधक के भीतर नई ऊर्जा का संचार करता है। उन्होंने कहा कि वास्तविक साधना वही है, जो मनुष्य को अहंकार से मुक्त कर विनम्रता और करुणा की ओर ले जाए।
ब्रह्ममुहूर्त की साधना देती है अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा
उन्होंने बताया कि शास्त्रों में ब्रह्ममुहूर्त को देवताओं का समय कहा गया है। गुप्त नवरात्रि में प्रातः चार बजे से छह बजे के बीच किया गया ध्यान और मंत्र-जप विशेष फलदायी माना गया है। इस समय वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा अधिक होती है, जिससे मन शीघ्र एकाग्र होता है और साधना का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि दिन की शुरुआत स्नान, ध्यान और मां भगवती की आराधना से करें। सायंकाल दीप प्रज्ज्वलित कर दुर्गा सप्तशती, देवी कवच अथवा श्रीसूक्त का पाठ करें तथा रात्रि में कुछ समय मौन रहकर आत्मचिंतन अवश्य करें। यही अभ्यास मानसिक तनाव को दूर कर आत्मविश्वास को मजबूत बनाता है।
साधना से पहले मन और स्थान दोनों की शुद्धि आवश्यक
डॉ. सचिन्द्र नाथ महाराज ने कहा कि पूजा केवल विधि-विधान का विषय नहीं है, बल्कि शुद्ध भावना का भी विषय है। इसलिए सबसे पहले अपने मन को ईर्ष्या, द्वेष और नकारात्मक विचारों से मुक्त करना चाहिए। इसके बाद पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र कर मां दुर्गा का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें तथा कलश स्थापना कर दीप प्रज्ज्वलित करें।
भगवान गणेश का स्मरण करने के पश्चात माता भगवती का आवाहन करें और पुष्प, अक्षत, रोली, चंदन, धूप तथा नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' मंत्र का जप अथवा दुर्गा सप्तशती का पाठ श्रद्धा के साथ करें। उन्होंने कहा कि पूजा की भव्यता नहीं, बल्कि श्रद्धा की गहराई ही साधना को सफल बनाती है।
सात्त्विक जीवनशैली ही है सच्ची उपासना
उन्होंने कहा कि गुप्त नवरात्रि के दौरान भोजन और व्यवहार दोनों पर विशेष नियंत्रण आवश्यक है। साधक को तामसिक भोजन, नशा, मांसाहार, प्याज और लहसुन से दूरी बनानी चाहिए। सात्त्विक भोजन ग्रहण करने से शरीर और मन दोनों पवित्र बने रहते हैं, जिससे साधना में एकाग्रता बढ़ती है।
इसके साथ ही क्रोध, कटु वाणी, असत्य, निंदा और अहंकार जैसी प्रवृत्तियों से भी बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति बाहर से पूजा करे और भीतर नकारात्मकता बनाए रखे, तो साधना का अपेक्षित फल प्राप्त नहीं होता।
सेवा, दान और करुणा से पूर्ण होती है साधना
डॉ. सचिन्द्र नाथ महाराज ने बताया कि देवी आराधना केवल मंदिर तक सीमित नहीं होनी चाहिए। गुप्त नवरात्रि के दौरान जरूरतमंदों की सहायता, गौसेवा, कन्या सम्मान, वृक्षारोपण तथा समाज हित के कार्य भी साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। जब पूजा के साथ सेवा का भाव जुड़ जाता है, तभी देवी कृपा का वास्तविक अनुभव होता है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के लिए कार्य करता है, वही सच्चे अर्थों में देवी शक्ति का उपासक कहलाने का अधिकारी है।
आधुनिक जीवन में क्यों बढ़ गया है गुप्त नवरात्रि का महत्व
तेजी से बदलती जीवनशैली, बढ़ते तनाव, प्रतिस्पर्धा और मानसिक असंतुलन के इस दौर में गुप्त नवरात्रि का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। डॉ. सचिन्द्र नाथ महाराज के अनुसार यह पर्व मनुष्य को कुछ समय स्वयं के लिए निकालने, मन को शांत करने और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करने का अवसर देता है। यदि व्यक्ति प्रतिदिन कुछ समय ध्यान और मंत्र-जप को दे, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता भी विकसित होती है।
आत्मविजय ही है देवी साधना की सबसे बड़ी सिद्धि
उन्होंने कहा कि गुप्त नवरात्रि का सबसे बड़ा संदेश आत्मविजय है। संसार को जीतने से पहले मनुष्य को अपने भीतर के क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और अहंकार पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। जब मन निर्मल होता है, तभी ज्ञान, भक्ति, शक्ति और करुणा का संतुलन जीवन में स्थापित होता है। यही देवी उपासना का वास्तविक उद्देश्य और गुप्त नवरात्रि की सबसे बड़ी सिद्धि है।
लेख के अंत में डॉ. सचिन्द्र नाथ महाराज ने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि गुप्त नवरात्रि को केवल धार्मिक परंपरा के रूप में न देखें, बल्कि इसे आत्मपरिवर्तन का अभियान बनाएं। उन्होंने कहा कि यदि इन नौ दिनों में व्यक्ति अपने विचार, व्यवहार और जीवनशैली को सकारात्मक दिशा दे दे, तो यही साधना उसके पूरे जीवन को नई ऊर्जा, नई चेतना और नई सफलता की ओर अग्रसर कर सकती है। ऐसी साधना ही मानव जीवन को सार्थक बनाती है और यही गुप्त नवरात्रि का शाश्वत संदेश भी है।
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