तेल अवीव/वॉशिंगटन। इजराइल की राजनीति में मतदान से पहले बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की ईरान नीति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि मतदान से ठीक दो दिन पहले नेतन्याहू ईरान के खिलाफ एक गुप्त सैन्य कार्रवाई करना चाहते थे, लेकिन इजराइली सेना के प्रमुख इयाल जामिर ने जल्दबाजी में कदम उठाने से इनकार कर दिया। इसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या नेतन्याहू ईरान के साथ टकराव को चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहते थे?

हालांकि, युद्ध को चुनावी रणनीति के तौर पर इस्तेमाल करने के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि इस विवाद का नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति पर कितना असर पड़ता है।

मतदान से पहले नेतन्याहू और सेना प्रमुख के बीच टकराव!

इजराइल में मतदान से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और इजराइली रक्षा बल यानी आईडीएफ के प्रमुख इयाल जामिर के बीच कथित मतभेद चर्चा में हैं।

इजराइल के चैनल 12 की रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने मतदान से दो दिन पहले ईरान के खिलाफ एक गुप्त सैन्य कार्रवाई के निर्देश दिए थे। लेकिन सेना प्रमुख जामिर ने तत्काल कार्रवाई करने के बजाय इस मामले पर विस्तृत रणनीतिक चर्चा की जरूरत बताई।

रिपोर्ट में सामने आए इस घटनाक्रम ने इजराइल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहा है कि क्या नेतन्याहू ईरान के खिलाफ सख्त कार्रवाई करके चुनाव से पहले अपनी छवि मजबूत करना चाहते थे या इसके पीछे कोई सैन्य रणनीति थी?

क्या ईरान अब इजराइल के लिए बड़ा खतरा नहीं?

इस पूरे विवाद में सबसे अहम सवाल ईरान से जुड़े खतरे का है।

रिपोर्ट के अनुसार, आईडीएफ प्रमुख इयाल जामिर का आकलन था कि इजराइल के पिछले हमलों ने ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को काफी नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में तत्काल नई सैन्य कार्रवाई करने से पहले स्थिति का व्यापक आकलन जरूरी था।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ईरान से खतरा पूरी तरह खत्म हो गया है। ईरान की सैन्य क्षमताओं और संभावित जवाबी कार्रवाई को लेकर स्थिति का आकलन सैन्य और खुफिया जानकारियों पर निर्भर करता है।

यही वजह है कि नेतन्याहू और सेना प्रमुख के बीच बताए जा रहे मतभेद को केवल राजनीतिक विवाद के रूप में देखना सही नहीं होगा। इसके पीछे सैन्य जोखिम और रणनीतिक फैसलों से जुड़े सवाल भी हो सकते हैं।

क्या युद्ध को चुनावी हथियार बना रहे थे नेतन्याहू?

नेतन्याहू लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को इजराइल की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बताते रहे हैं। ईरान के खिलाफ सख्त रुख उनकी राजनीतिक रणनीति का भी अहम हिस्सा रहा है।

लेकिन मतदान से ठीक पहले सैन्य कार्रवाई की कथित कोशिश ने विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या ईरान के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत थी? क्या इसका चुनावी माहौल पर भी असर पड़ सकता था? और क्या सेना प्रमुख ने संभावित सैन्य जोखिमों को देखते हुए जल्दबाजी से बचने की सलाह दी?

इन सवालों के जवाब सामने आना अभी बाकी है। केवल समय के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि युद्ध की तैयारी का उद्देश्य वोट हासिल करना था।

ट्रंप ने की नेतन्याहू की तारीफ

इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू के नेतृत्व की तारीफ करते हुए कहा कि मुश्किल परिस्थितियों में उन्होंने प्रधानमंत्री के तौर पर अच्छा काम किया है।

ट्रंप के इस बयान को ऐसे समय में अहम माना जा रहा है, जब इजराइल की सुरक्षा नीति, ईरान के साथ टकराव और नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हैं।

हालांकि, अमेरिकी समर्थन और इजराइल के घरेलू राजनीतिक समीकरण अलग-अलग विषय हैं। ट्रंप की तारीफ का चुनावी नतीजों पर क्या असर पड़ेगा, यह मतदाताओं के रुख पर निर्भर करेगा।

अब चुनावी नतीजों पर टिकी नजरें

इजराइल की संसद में कुल 120 सीटें हैं। चुनाव में मतदाताओं का रुख तय करेगा कि नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति कितनी मजबूत रहती है और देश की भावी सरकार की दिशा क्या होगी।

फिलहाल, ईरान के खिलाफ कथित सैन्य कार्रवाई को लेकर सामने आई रिपोर्ट ने नेतन्याहू की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है, तो दूसरी तरफ आरोप हैं कि सैन्य टकराव का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश की जा सकती है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या नेतन्याहू की ईरान नीति उनकी राजनीतिक ताकत बनेगी या चुनाव से पहले उठे ये सवाल उनके लिए मुश्किलें बढ़ाएंगे?