ढाका। बांग्लादेश में कानून अपने हाथ में लेने और भीड़ द्वारा कथित आरोपियों को खुद सजा देने की घटनाएं गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही हैं। ढाका स्थित मानवाधिकार संगठन ऐन ओ सालिश केंद्र (ASK) के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से अगस्त 2026 के बीच देश में भीड़ हिंसा में कम से कम 154 लोगों की मौत हुई। दूसरे मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स सपोर्ट सोसाइटी (HRSS) ने इसी अवधि में 178 मौतों का आंकड़ा दिया है।
इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि भीड़ हिंसा अब अलग-अलग घटनाओं तक सीमित नहीं रह गई है। चोरी, डकैती, धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप, व्यक्तिगत विवाद, स्थानीय दुश्मनी या सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों के बाद कई मामलों में लोग कानून की प्रक्रिया का इंतजार किए बिना कथित आरोपी पर हमला कर देते हैं। जून में प्रकाशित एक रिपोर्ट में भी विशेषज्ञों ने भीड़ हिंसा को महज कानून-व्यवस्था की समस्या के बजाय संस्थागत और सामाजिक चुनौती बताया था।
8 महीने में 154 मौतें, आंकड़ा क्या बताता है?
ASK के जनवरी-अगस्त 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भीड़ हिंसा में सबसे ज्यादा मौतें ढाका डिवीजन में 57 हुईं। इसके बाद चटगांव में 34, खुलना में 20, राजशाही में 15, बरिशाल और मयमनसिंह में 11-11 तथा रंगपुर में छह मौतें दर्ज की गईं।
वहीं HRSS ने इसी आठ महीने की अवधि में 178 मौतों के साथ 369 लोगों के घायल होने की जानकारी दी है। दोनों संगठनों के आंकड़ों में अंतर है, लेकिन दोनों ही रिपोर्टें भीड़ हिंसा की गंभीरता की ओर इशारा करती हैं।
आरोप लगते ही भीड़ क्यों बन जाती है ‘अदालत’?
बांग्लादेश में सामने आए कई मामलों में लोगों पर चोरी या डकैती का संदेह, धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप या अन्य विवाद सामने आने के बाद भीड़ ने कानून अपने हाथ में लिया। द डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल-जून 2026 के दौरान 33 लोग भीड़ के हमलों में मारे गए। रिपोर्ट में कहा गया कि कई पीड़ितों को चोरी या डकैती के संदेह में पीट-पीटकर मार डाला गया, जबकि कुछ मामले अनौपचारिक ग्रामीण मध्यस्थता और धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोपों से जुड़े थे।
यानी कई मामलों में आरोप और दोष साबित होने के बीच की कानूनी प्रक्रिया ही गायब होती दिखती है। किसी व्यक्ति पर संदेह या आरोप लगने के बाद भीड़ खुद जांचकर्ता, अभियोजक और सजा देने वाली ताकत की भूमिका में आ जाती है।
2024 के राजनीतिक बदलाव के बाद भी खत्म नहीं हुई समस्या
जुलाई-अगस्त 2024 के राजनीतिक उथल-पुथल के बाद बांग्लादेश में अंतरिम सरकार का गठन हुआ था। फरवरी 2026 के चुनाव के बाद BNP के नेतृत्व में नई सरकार सत्ता में आई। लेकिन सरकार बदलने के बावजूद भीड़ हिंसा की घटनाओं में कमी का स्पष्ट संकेत नहीं मिला। जून 2026 में ढाका ट्रिब्यून ने ASK के हवाले से बताया था कि जनवरी-मई के दौरान ही भीड़ हिंसा में कम से कम 89 लोगों की मौत हो चुकी थी।
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल बांग्लादेश (TIB) की 2026 की समीक्षा में भी कहा गया कि सख्त कदम उठाए जाने के बावजूद भीड़ हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं किया जा सका।
कानून-व्यवस्था पर भरोसे का सवाल
विशेषज्ञों के मुताबिक, लगातार होने वाली भीड़ हिंसा के पीछे कानून लागू करने वाली संस्थाओं पर भरोसे की कमी, राजनीतिक ध्रुवीकरण, दंड से बच निकलने की धारणा और सोशल मीडिया पर अफवाहों का तेजी से फैलना जैसे कारण हो सकते हैं। ढाका ट्रिब्यून ने विशेषज्ञों के हवाले से कहा कि अगर भीड़ हिंसा के जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह नहीं बनाया गया तो ऐसी घटनाएं जारी रह सकती हैं।
मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि किसी भी आरोप की जांच पुलिस और न्यायिक व्यवस्था के जरिए होनी चाहिए, न कि भीड़ के जरिए।
सत्ता बदली, लेकिन ‘मॉब जस्टिस’ का खतरा बरकरार
बांग्लादेश में 2025 के दौरान भी भीड़ हिंसा एक बड़ी मानवाधिकार चिंता रही थी। ASK के आंकड़ों के मुताबिक उस साल कम से कम 197 लोग भीड़ हमलों में मारे गए, जबकि 2024 में यह संख्या 128 थी।
2026 के शुरुआती आठ महीनों में 154 मौतों का आंकड़ा इस समस्या की निरंतरता को दिखाता है। हालांकि अलग-अलग संगठनों के आंकड़ों में अंतर है, लेकिन व्यापक तस्वीर यही है कि कानूनी प्रक्रिया के बाहर हिंसा और भीड़ द्वारा सजा देने की प्रवृत्ति बांग्लादेश में गंभीर चुनौती बनी हुई है।
किसी व्यक्ति पर आरोप लगना और उसका दोष अदालत में साबित होना दो अलग बातें हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम फैसला जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए—भीड़ के दबाव या हिंसा के आधार पर नहीं।
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