रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर बढ़ सकता है अमेरिकी दबाव, प्रस्तावित कानून के तहत 100% तक टैरिफ लगाने की चर्चा; भारतीय निर्यातकों और अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है असर
नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंधों के बीच एक बार फिर टैरिफ को लेकर चर्चा तेज हो गई है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के बयान के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का फैसला कर सकते हैं? गोर के मुताबिक, रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर संभावित प्रतिबंधों को लेकर चर्चा जारी है और इस संबंध में अगले करीब 10 दिनों में फैसला लिया जा सकता है।
दिल्ली में गुरुवार को आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में गोर ने कहा कि इस मामले में अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। उन्होंने प्रतिबंधों की संभावित व्यवस्था का जिक्र करते हुए बताया कि संबंधित देशों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया है। भारत का नाम भी उन देशों के संदर्भ में सामने आया है जिन पर यह व्यवस्था लागू हो सकती है।
हालांकि, 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का अंतिम फैसला होने की पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए फिलहाल इसे संभावित अमेरिकी कदम के तौर पर ही देखा जाना चाहिए, न कि भारत पर लागू हो चुके नए टैरिफ के रूप में।
रूस से तेल खरीदने पर क्यों है विवाद?
इस पूरे मामले की जड़ रूस से भारत की ऊर्जा खरीद है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। रूस से प्रतिस्पर्धी कीमतों पर तेल मिलने के कारण भारत वहां से खरीद करता रहा है। इससे देश की ऊर्जा जरूरतों और आयात लागत को प्रबंधित करने में मदद मिलती है।
दूसरी ओर, अमेरिका रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई को सीमित करना चाहता है। उसका तर्क है कि रूस की तेल और गैस से होने वाली आय यूक्रेन युद्ध जारी रखने की उसकी क्षमता को बनाए रखने में मदद करती है। इसी कारण रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के प्रस्ताव चर्चा में हैं।
भारत के लिए चुनौती यह है कि उसे अपनी ऊर्जा सुरक्षा और किफायती आयात को ध्यान में रखते हुए अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों तथा व्यापारिक दबावों के बीच संतुलन बनाना होगा।
100% टैरिफ लगाने की चर्चा कहां से आई?
अमेरिका में ऐसे प्रस्तावित कानून पर चर्चा हुई है, जिसके तहत रूस से तेल या अन्य ऊर्जा उत्पाद खरीदने वाले देशों के सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया जा सकता है। भारत और चीन जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश इस चर्चा के दायरे में आ सकते हैं।
लेकिन प्रस्तावित कानून, राष्ट्रपति के अंतिम निर्णय और वास्तव में लागू किए गए टैरिफ के बीच अंतर समझना जरूरी है। जब तक आधिकारिक निर्णय और उसके लागू होने की शर्तें स्पष्ट नहीं होतीं, तब तक यह कहना सही नहीं होगा कि भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ निश्चित रूप से लगाया जाएगा।
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