राजनीति की धूल, समाज की पीड़ा और सनातन की चेतना के बीच पूर्व विधायक उदयभान करवरिया ने दिया स्पष्ट संदेश 


प्रयागराज। राजनीति अक्सर सत्ता के शोर में व्यक्तित्वों को आंकती है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनकी पहचान चुनावी जीत-हार से कहीं आगे जाकर समाज की सोच और वैचारिक प्रतिबद्धता से बनती है। प्रयागराज की राजनीति में पूर्व विधायक उदयभान करवरिया ऐसा ही एक नाम हैं। दो बार विधायक रह चुके करवरिया आज भी पूर्वांचल की राजनीति में प्रभावशाली हस्ताक्षर माने जाते हैं। ब्राह्मण समाज के वर्तमान स्वरूप, सनातन की मूल चेतना, बदलती राजनीतिक संस्कृति, शिक्षा व्यवस्था और आने वाले राजनीतिक भविष्य पर उन्होंने बेबाकी से अपने विचार रखे। यह बातचीत केवल एक नेता का राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि सामाजिक आत्ममंथन का दस्तावेज भी प्रतीत होती है।


वैभव नहीं, यश ही ब्राह्मण की है सबसे बड़ी संपत्ति

बातचीत की शुरुआत में ही उदयभान करवरिया ने ब्राह्मण समाज की मूल पहचान को बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों में परिभाषित किया। उन्होंने कहा, "ब्राह्मण धनवान नहीं होता, लेकिन यशवान अवश्य होता है।" उनके अनुसार किसी व्यक्ति का सम्मान उसके बैंक खाते से नहीं, बल्कि उसके संस्कार, विद्वता और सामाजिक प्रतिष्ठा से तय होता है। तिवारी, दुबे, मिश्रा, शुक्ला, पाठक, उपाध्याय या किसी भी ब्राह्मण कुल का व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर हो सकता है, लेकिन उसकी सांस्कृतिक पहचान कभी छोटी नहीं होती। यही आत्मगौरव समाज की सबसे बड़ी पूंजी है।


पूजा में सम्मान, लेकिन सत्ता में उपेक्षा— आखिर यह विरोधाभास क्यों?

भारतीय परंपरा में ब्राह्मण सदैव ज्ञान, धर्म और नैतिक नेतृत्व का प्रतीक रहा है। आज भी शुभ कार्यों से लेकर जीवन के अंतिम संस्कार तक उसकी उपस्थिति आवश्यक मानी जाती है। लेकिन करवरिया का मानना है कि राजनीति के गलियारों में वही समाज अक्सर निर्णय प्रक्रिया से दूर दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि चुनाव के समय ब्राह्मणों की जरूरत महसूस की जाती है, किंतु सत्ता के संचालन में उनकी वैचारिक भागीदारी अपेक्षित स्तर पर नहीं दिखती। यह स्थिति चिंतन का विषय है।


शास्त्रों के साथ विज्ञान और तकनीक में भी अब करना होगा नेतृत्व

पूर्व विधायक का मानना है कि समय के साथ जिम्मेदारियां भी बदलती हैं। आज का ब्राह्मण केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रह सकता। शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और सामाजिक नेतृत्व में भी उसे अग्रणी भूमिका निभानी होगी। उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि राजनीति में सक्रिय भागीदारी जरूरी है, लेकिन जातीय टकराव नहीं बल्कि विकास, सुशासन, शिक्षा और राष्ट्रहित को केंद्र में रखकर आगे बढ़ना ही वास्तविक नेतृत्व होगा।


जिस घर की बेटी की चिंता समाज करे, वही समाज रहता है जीवित


सामाजिक सेवा को राजनीति से ऊपर बताते हुए करवरिया ने कहा कि वर्षों से वे आर्थिक रूप से कमजोर ब्राह्मण परिवारों की बेटियों के विवाह में अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करते रहे हैं। उनके अनुसार किसी समाज की वास्तविक ताकत उसके भाषणों में नहीं, बल्कि उसके संवेदनशील व्यवहार में दिखाई देती है। जरूरतमंद परिवारों के साथ खड़ा होना उनका सामाजिक दायित्व है, जिसे वे आगे भी निभाते रहेंगे।


मेरी राजनीति का केंद्र सत्ता नहीं, अन्याय के खिलाफ खड़ा आम आदमी है

जनता के मुद्दों पर अपने रुख को स्पष्ट करते हुए उदयभान करवरिया ने कहा कि उन्होंने कभी यह नहीं देखा कि पीड़ित व्यक्ति किस दल का समर्थक है। यदि किसी के साथ अन्याय होता है तो वे उसके साथ खड़े होते हैं। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा, "मुझे किसी का डर नहीं है। मैं सदैव आम जनमानस के लिए जिया हूं और आगे भी जनता की आवाज बनकर न्याय दिलाने का कार्य करता रहूंगा।"


2027 से पहले पूर्वांचल की राजनीति में एक नई दस्तक सुनाई देगी

आगामी राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर उन्होंने संकेत दिया कि वर्ष 2027 से पहले पूर्वांचल में एक नई वैचारिक मुहिम शुरू होगी। उनके अनुसार यह अभियान केवल चुनावी लाभ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समाज को सकारात्मक सोच और मजबूत संगठन के साथ जोड़ने का प्रयास करेगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय जनता पार्टी नए उत्साह और नई रणनीति के साथ फिर जनता का विश्वास हासिल करेगी।


एक जैसी शिक्षा ही बराबरी का बन सकती है सबसे मजबूत आधार 

देश की शिक्षा व्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए करवरिया ने कहा कि 'एक फीस, एक बोर्ड और एक पाठ्यक्रम' जैसे विषयों पर गंभीर राष्ट्रीय चर्चा होनी चाहिए। उनका मानना है कि प्रतिभा किसी आर्थिक वर्ग की बपौती नहीं होती, इसलिए प्रत्येक छात्र को समान अवसर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में होना चाहिए।


जब छात्र का संघर्ष राजनीति का मंच बन जाए, तब मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है

नीट परीक्षा और पेपर लीक के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि छात्रों की निष्पक्ष परीक्षा व्यवस्था की मांग पूरी तरह उचित थी। लेकिन समय के साथ आंदोलन में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ने से उसका मूल उद्देश्य धुंधला पड़ गया। उन्होंने कहा कि छात्र भविष्य चाहते हैं, जबकि राजनीतिक दल अवसर तलाशते हैं। इसलिए शिक्षा सुधार को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से अलग रखकर समाधान निकालना समय की मांग है।


ज्ञान, चरित्र और सेवा ही वह मार्ग है, जहां से भविष्य का नेतृत्व निकलेगा

बातचीत के समापन पर उदयभान करवरिया ने कहा कि किसी भी समाज का सम्मान केवल इतिहास के गौरव से नहीं, बल्कि वर्तमान के योगदान से तय होता है। ब्राह्मण समाज को भी अपने ज्ञान, चरित्र, शोध, संगठन और सेवा के माध्यम से स्वयं को पुनः स्थापित करना होगा। उनका विश्वास है कि जिस दिन समाज फिर से नैतिकता और ज्ञान का प्रकाशस्तंभ बनेगा, उसी दिन राजनीति भी उसके योगदान को सम्मान देने के लिए बाध्य होगी। यही भारत की सांस्कृतिक शक्ति है और यही भविष्य का मार्ग भी।