डॉ. अश्वनी टंडन की चेतावनी—मोबाइल जरूरत तक रहे तो सुविधा, आदत बन जाए तो नींद, शरीर और रिश्तों पर पड़ता है असर
वाराणसी। आध्यात्मिक नगरी काशी अब आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन रही है। सरकारी और निजी चिकित्सा संस्थानों में गंभीर बीमारियों के उपचार की सुविधाओं के विस्तार के बीच स्वास्थ्य के सामने एक नई चुनौती तेजी से उभरी है—बदलती जीवनशैली और मोबाइल पर बढ़ती निर्भरता। सुबह आंख खुलने से लेकर रात में सोने तक स्क्रीन के साथ गुजरता समय न केवल दिनचर्या बदल रहा है, बल्कि नींद, आंखों, गर्दन-पीठ, मानसिक एकाग्रता और पारिवारिक संवाद पर भी असर डाल रहा है। शिवपुर स्थित जमुना सेवा सदन के एमडी डॉ. अश्वनी टंडन इसे आधुनिक जीवन की गंभीर चुनौती मानते हैं। उनका कहना है कि तकनीक से दूरी समाधान नहीं है, बल्कि उसका अनुशासित इस्तेमाल सीखना जरूरी है। बातचीत में उन्होंने काशी में चिकित्सा सेवा, मोबाइल पर निर्भरता और स्वस्थ जीवनशैली के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से अपनी बात रखी। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश...
काशी में चिकित्सा नहीं, सेवा को भी मानते हैं दायित्व
डॉ. अश्वनी टंडन कहते हैं कि मोक्ष की नगरी काशी में रहकर लोगों की सेवा करने का अवसर मिलना उनके लिए सौभाग्य की बात है। बाबा विश्वनाथ और हनुमान जी के आशीर्वाद से जमुना सेवा सदन में प्रत्येक मंगलवार निशुल्क चिकित्सा जांच एवं दवा वितरण किया जाता है। उनका मानना है कि अस्पताल का दायित्व केवल बीमारी का उपचार करना नहीं, बल्कि समाज को स्वस्थ रहने के प्रति जागरूक करना भी है। जरूरतमंद तक समय पर जांच, सलाह और दवा पहुंच जाए तो कई स्वास्थ्य समस्याओं को गंभीर होने से पहले ही नियंत्रित किया जा सकता है।
सुबह की पहली और रात की आखिरी नजर स्क्रीन पर
डॉ. टंडन के मुताबिक मोबाइल ने दैनिक जीवन को जितना आसान बनाया है, उसके अनियंत्रित इस्तेमाल ने उतनी ही तेजी से दिनचर्या को प्रभावित भी किया है। बच्चा हो या बुजुर्ग, विद्यार्थी हो या नौकरीपेशा व्यक्ति—सुबह आंख खुलते ही मोबाइल देखना और रात में सोने से पहले स्क्रीन पर समय बिताना सामान्य आदत बनती जा रही है। पहले सुबह टहलना, योग करना और परिवार के साथ समय बिताना दिनचर्या का हिस्सा था, लेकिन अब कई लोग बिस्तर पर ही रील और वीडियो देखने लगते हैं। भोजन और काम के दौरान भी बार-बार फोन देखने की आदत शरीर को निष्क्रिय और मन को लगातार व्यस्त रख रही है।
गर्दन से नींद तक, शरीर चुका रहा स्क्रीन की कीमत
लगातार मोबाइल देखने की आदत के शारीरिक प्रभावों पर डॉ. टंडन विशेष चिंता जताते हैं। उनका कहना है कि लंबे समय तक गर्दन झुकाकर स्क्रीन देखने से गर्दन और पीठ में दर्द जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। लगातार स्क्रीन देखने से आंखों में सूखापन, जलन और सिरदर्द की शिकायत भी हो सकती है। रात में लंबे समय तक स्क्रीन पर रहने से नींद का समय और गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिसका असर अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन और काम में एकाग्रता पर दिखाई देता है। मोबाइल पर बिताया बढ़ता समय यदि शारीरिक गतिविधि की जगह लेने लगे तो निष्क्रिय जीवनशैली से जुड़ी दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है।
दुनिया से जुड़ते-जुड़ते अपनों से बढ़ रही दूरी
डॉ. टंडन के अनुसार मोबाइल की चुनौती केवल शरीर तक सीमित नहीं है। इसका असर परिवार और सामाजिक जीवन पर भी दिखाई दे रहा है। कई घरों में सदस्य एक साथ बैठने के बावजूद अपने-अपने फोन में व्यस्त रहते हैं। बच्चों का खेलना और परिवार के साथ संवाद करना कम होता जा रहा है, जबकि युवाओं का काफी समय सोशल मीडिया पर गुजर रहा है। भोजन के समय फोन, बातचीत के बीच नोटिफिकेशन और खाली समय में लगातार वीडियो देखने की आदत वास्तविक संवाद को कम कर रही है। उनकी चिंता है कि तकनीक ने दुनिया से संपर्क आसान बनाया, लेकिन यदि उसका संतुलन बिगड़ा तो व्यक्ति अपने सबसे नजदीकी रिश्तों से ही दूर हो सकता है।
मोबाइल छोड़ना नहीं, उसके इस्तेमाल की सीमा तय करना जरूरी
समाधान के सवाल पर डॉ. टंडन मोबाइल से पूरी तरह दूरी बनाने के बजाय अनुशासन को जरूरी मानते हैं। उनका सुझाव है कि दिन में कुछ समय फोन से पूरी तरह दूर रखा जाए। रात में सोने से करीब एक घंटे पहले स्क्रीन बंद करने की आदत बनाई जाए और बच्चों के लिए स्पष्ट स्क्रीन समय निर्धारित हो। परिवार के सदस्य कम से कम भोजन के समय मोबाइल अलग रखें। सुबह टहलना, व्यायाम, पुस्तक पढ़ना और प्रकृति के बीच समय बिताना दिनचर्या में लौटे। गैरजरूरी नोटिफिकेशन बंद करने और मोबाइल अनुप्रयोगों पर समय सीमा तय करने से भी स्क्रीन पर अनावश्यक समय कम किया जा सकता है।
स्क्रीन पर नियंत्रण रहेगा, तभी जिंदगी से बना रहेगा जुड़ाव
डॉ. अश्वनी टंडन का संदेश स्पष्ट है—मोबाइल आधुनिक जीवन की जरूरत है, लेकिन उसे जीवन पर नियंत्रण करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। तकनीक तभी उपयोगी है, जब उसका इस्तेमाल व्यक्ति अपनी जरूरत और समय के अनुसार करे। स्वस्थ शरीर, पर्याप्त नींद, परिवार के साथ संवाद और वास्तविक सामाजिक रिश्तों की जगह कोई डिजिटल माध्यम नहीं ले सकता। इसलिए स्क्रीन से समय निकालकर स्वयं, परिवार और आसपास की जिंदगी से जुड़ना जरूरी है। असली संतोष लाइक्स और नोटिफिकेशन की संख्या में नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर, शांत मन और जीवंत रिश्तों में है।
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