हर कण में शंकर, हर मन में महादेव... सावन के पहले सोमवार पर शिव में समाई काशी
वाराणसी। काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि भगवान शिव की शाश्वत नगरी है। यहां कहा जाता है कि "कंकर-कंकर में शंकर" बसते हैं। सावन का पहला सोमवार आते ही यह मान्यता केवल आस्था नहीं रहती, बल्कि हर गली, हर घाट और हर मंदिर में साकार दिखाई देने लगती है। सोमवार की भोर होते-होते पूरी काशी शिवमय हो उठी। गंगा की लहरों पर गूंजती आरती, मंदिरों की घंटियों की अनुगूंज, शंखध्वनि, वैदिक मंत्रोच्चार और "हर-हर महादेव" के गगनभेदी उद्घोष ने ऐसा अलौकिक वातावरण रच दिया, मानो स्वयं भोलेनाथ अपनी प्रिय नगरी का आशीर्वाद देने अवतरित हो गए हों।
सावन के प्रथम सोमवार पर श्री काशी विश्वनाथ धाम में ब्रह्ममुहूर्त से ही श्रद्धालुओं की अंतहीन कतारें लग गईं। देश के कोने-कोने से आए शिवभक्त हाथों में गंगाजल, बेलपत्र, भांग, धतूरा और पुष्प लिए बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक करने पहुंचे। घंटों की प्रतीक्षा के बाद जब श्रद्धालु ज्योतिर्लिंग के सम्मुख पहुंचे तो उनकी आंखों में आस्था, चेहरे पर संतोष और मन में अद्भुत शांति का भाव साफ झलक रहा था।
लेकिन काशी की संस्कृति केवल विश्वनाथ धाम तक सीमित नहीं है। इस नगर की विशेषता यह है कि यहां हर मोहल्ले, हर मार्ग और हर घाट पर महादेव किसी न किसी स्वरूप में विराजमान हैं। यही कारण है कि सावन के पहले सोमवार को महामृत्युंजय महादेव, तिलभांडेश्वर महादेव, मार्कण्डेय महादेव, ओंकारेश्वर महादेव, केदारेश्वर महादेव, त्रिलोचन महादेव, पशुपतिनाथ महादेव, शूलटांकेश्वर महादेव सहित सैकड़ों प्राचीन शिवालयों में भी श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। कहीं रुद्राभिषेक हो रहा था, कहीं महामृत्युंजय जाप, कहीं भजन-कीर्तन तो कहीं शिवपुराण का पाठ। पूरी काशी एक साथ भगवान शिव की आराधना में लीन दिखाई दी।
माधोपुर स्थित प्राचीन श्री शूलटांकेश्वर महादेव मंदिर में सुबह से ही दर्शनार्थियों की लंबी कतारें लगी रहीं। मंदिर परिसर "बोल बम" और "हर-हर महादेव" के जयघोष से निरंतर गुंजायमान रहा। श्रद्धालुओं ने भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक कर परिवार की सुख-समृद्धि, राष्ट्र की उन्नति और विश्व शांति की कामना की। यही दृश्य काशी के अन्य शिवालयों में भी देखने को मिला, जहां श्रद्धा और भक्ति का अनुपम संगम साकार हुआ।
सावन के प्रथम सोमवार पर काशी की सांस्कृतिक विरासत भी पूरी भव्यता के साथ दिखाई दी। गलियों में केसरिया वस्त्रधारी कांवड़ियों की टोलियां, गंगा घाटों पर स्नान कर जल भरते श्रद्धालु, मंदिरों में गूंजते वैदिक मंत्र, प्रसाद और बेलपत्र से सजे बाजार, शिव भजनों से मुखरित चौराहे और हर घर में जलते दीपक—इन सबने मिलकर यह प्रमाणित कर दिया कि काशी की पहचान केवल उसकी प्राचीनता नहीं, बल्कि उसकी जीवंत सनातन संस्कृति है, जो हर सावन में नए उत्साह के साथ धड़कने लगती है।
श्रद्धा के इस महासंगम के बीच प्रशासन भी पूरी तरह मुस्तैद दिखाई दिया। श्री काशी विश्वनाथ धाम सहित प्रमुख शिवालयों और संवेदनशील स्थलों पर ड्रोन कैमरों से लगातार निगरानी की गई। वरिष्ठ प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों ने स्वयं विभिन्न मार्गों और मंदिरों का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। बैरिकेडिंग, रूट डायवर्जन, यातायात नियंत्रण, पेयजल, चिकित्सा सहायता, साफ-सफाई और सुरक्षा के व्यापक प्रबंधों के कारण लाखों श्रद्धालुओं को व्यवस्थित और सुरक्षित दर्शन कराए गए।
सावन का पहला सोमवार काशी में केवल एक धार्मिक पर्व नहीं होता, बल्कि यह उस सनातन परंपरा का जीवंत उत्सव है, जिसने हजारों वर्षों से इस नगरी की आत्मा को जीवित रखा है। यहां बाबा विश्वनाथ केवल मंदिर के गर्भगृह में ही नहीं, बल्कि हर गली, हर घाट, हर शिवालय और हर श्रद्धालु के हृदय में विराजते हैं। इसलिए कहा जाता है—काशी में सावन आता नहीं, बल्कि स्वयं महादेव अपनी नगरी में उतर आते हैं, और पूरी काशी शिवमय होकर उनका स्वागत करती है।
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