वाराणसी। सावन की पहली भोर... गंगा के निर्मल तट... हर-हर महादेव के अनवरत जयघोष... और केसरिया वस्त्रों में उमड़े शिवभक्त। गुरुवार को शिव की नगरी काशी का ऐसा दिव्य और अलौकिक स्वरूप देखने को मिला, मानो स्वयं देवाधिदेव महादेव अपनी प्रिय नगरी में भक्तों के बीच विराजमान हों।
मां गंगा के पावन तट पर आस्था केवल जल लेने तक सीमित नहीं रही, बल्कि हर श्रद्धालु ने गंगाजल को जीवन, प्रकृति और संस्कृति का अमृत मानते हुए उसे संरक्षित रखने का संकल्प भी लिया। नमामि गंगे के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में शिवभक्तों ने मां गंगा की आरती उतारी, घाटों की स्वच्छता में सहभागिता निभाई और यह संदेश दिया कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आस्था, संस्कृति और जीवनधारा हैं।
नमामि गंगे काशी क्षेत्र के संयोजक एवं नगर निगम के स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर राजेश शुक्ला ने श्रद्धालुओं को गंगा संरक्षण और सिंगल यूज प्लास्टिक का त्याग करने की शपथ दिलाते हुए कहा कि सावन का यह पावन पर्व हमें जल के महत्व का बोध कराता है। कांवर यात्रा का वास्तविक संदेश केवल भगवान शिव का जलाभिषेक नहीं, बल्कि प्रकृति, नदियों और जल स्रोतों के संरक्षण का संकल्प भी है।
उन्होंने कहा कि जिस गंगाजल से शिव का अभिषेक किया जाता है, वही जल खेतों की हरियाली, पशु-पक्षियों के जीवन और मानव सभ्यता की सांसों का आधार है। यदि हम जल बचाने, नदियों को प्रदूषण से मुक्त रखने और पर्यावरण की रक्षा का संकल्प निभाएं, तभी हमारी शिवभक्ति सार्थक होगी और भोलेनाथ की सच्ची कृपा प्राप्त होगी। गंगा तट पर उमड़ी आस्था की इस अनुपम छटा ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि काशी में धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और मानवता की सेवा से भी जुड़ा है।
कार्यक्रम में नवीन गुप्ता, नरेंद्र बघेल, रामकृष्ण सूर्यवंशी, प्रिंस शाही, चंद्रभूषण मिश्रा, महेंद्र, निखिल, विकास सिंह, हरिओम बाबा सहित बड़ी संख्या में कांवरियों और गंगा सेवियों ने सहभागिता कर मां गंगा के प्रति अपनी श्रद्धा और समर्पण व्यक्त किया।
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