35 वर्षों से आयुर्वेदिक चिकित्सा से जुड़े डॉ. महेश कुमार सिंह ने बताया कि—बदलती थाली और बिगड़ती दिनचर्या शरीर पर डाल रही बोझ, दवा से पहले जीवनशैली सुधारना जरूरी


वाराणसी। जब बीमारी शरीर में दस्तक दे, तभी इलाज शुरू हो—आयुर्वेद की सोच इससे कहीं आगे की है। यह चिकित्सा पद्धति रोग के उपचार के साथ उस जीवनशैली की भी बात करती है, जिसमें बीमारी की आशंका को कम करने और शरीर को स्वस्थ रखने पर जोर हो। बदलते दौर में जब हमारी थाली से लेकर सोने-जागने तक की आदतें तेजी से बदली हैं, तब हजारों वर्ष पुरानी आयुर्वेदिक जीवन पद्धति एक बार फिर लोगों का ध्यान खींच रही है।

‘आयु’ यानी जीवन और ‘वेद’ यानी ज्ञान। इसी विचार से निकला आयुर्वेद शरीर को केवल रोगों का घर मानकर उपचार नहीं करता, बल्कि आहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या और शरीर की प्रकृति के बीच संतुलन को स्वास्थ्य का आधार मानता है।

आखिर आधुनिक चिकित्सा के दौर में आयुर्वेद की प्रासंगिकता कितनी है? जड़ी-बूटियों वाली पुरानी चिकित्सा अब गोली और सिरप तक कैसे पहुंची? लिवर और किडनी की बढ़ती समस्याओं के पीछे बदलती जीवनशैली कितनी जिम्मेदार है? हर दर्द पर दर्द निवारक गोली लेना कितना उचित है और आयुर्वेद को भविष्य की चिकित्सा व्यवस्था में किस रूप में देखा जाना चाहिए?

इन्हीं सवालों को लेकर परफेक्ट मिशन के प्रतिनिधि ने वाराणसी के अस्सी स्थित मानव रोग निदान केंद्र के डॉ. महेश कुमार सिंह से विस्तार से बातचीत की। करीब पांच से छह दशक पुराने इस चिकित्सा केंद्र से जुड़े डॉ. सिंह लगभग 35 वर्षों से आयुर्वेदिक पद्धति से मरीजों को परामर्श दे रहे हैं। उनका कहना है कि यहां वाराणसी ही नहीं, देश के विभिन्न हिस्सों से मरीज आते हैं और इनमें लिवर व किडनी संबंधी समस्याओं वाले मरीजों की संख्या भी उल्लेखनीय रहती है। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश...


आयुर्वेद की पहली सीख—रोग मिटाना ही नहीं, स्वास्थ्य बचाना भी जरूरी

डॉ. महेश कुमार सिंह कहते हैं कि आयुर्वेद को केवल जड़ी-बूटी और दवाओं तक सीमित करके देखना इसकी व्यापकता को कम करके आंकना होगा। आयुर्वेद का संबंध जीवन से है। इसका उद्देश्य केवल बीमारी होने के बाद उसका उपचार करना नहीं, बल्कि ऐसी दिनचर्या और आहार-विहार अपनाना भी है जिससे व्यक्ति लंबे समय तक स्वस्थ रह सके। वात, पित्त और कफ के संतुलन के साथ व्यक्ति की प्रकृति, भोजन, दिनचर्या और मौसम के अनुसार जीवनशैली को आयुर्वेद में विशेष महत्व दिया गया है। यही कारण है कि आयुर्वेद उपचार के साथ स्वस्थ जीवन जीने का अनुशासन भी सिखाता है।


आधुनिक चिकित्सा के दौर में भी आयुर्वेद की तरफ क्यों लौट रहे लोग

डॉ. सिंह के मुताबिक लोगों में अब स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ी है और वे उपचार के विभिन्न विकल्पों के बारे में जानना चाहते हैं। आयुर्वेद में वनस्पतियों, जड़ी-बूटियों और परंपरागत औषधीय विधियों का विशेष स्थान है। उनका कहना है कि आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा को प्रतिस्पर्धी पद्धतियों के रूप में देखने के बजाय रोग और मरीज की स्थिति के अनुरूप योग्य चिकित्सक की सलाह को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। खासकर गंभीर और आपात स्थितियों में अपनी मर्जी से कोई उपचार बंद करना या बदलना उचित नहीं है।


सिल-बट्टे की जड़ी-बूटी अब गोली-सिरप में, क्या बदल गया आयुर्वेद?

कभी जड़ी-बूटियों को कूट-पीसकर औषधि तैयार करना आयुर्वेद की सामान्य पहचान थी। आज वही औषधियां चूर्ण, गोली, कैप्सूल और सिरप के रूप में उपलब्ध हैं। डॉ. सिंह बताते हैं कि समय के साथ औषधि निर्माण की तकनीक बदली है, लेकिन आयुर्वेदिक औषधियों का मूल आधार परंपरागत औषधीय द्रव्य और निर्धारित निर्माण विधियां हैं। आधुनिक मशीनों ने निर्माण को अधिक सुविधाजनक बनाया है। हालांकि वह यह भी कहते हैं कि बाजार से कोई भी आयुर्वेदिक उत्पाद लेने के बजाय उसकी गुणवत्ता और निर्माता की विश्वसनीयता देखना तथा योग्य चिकित्सक की सलाह लेना जरूरी है।


दिल और किडनी की बीमारी में ‘चमत्कार’ नहीं, सही चिकित्सा सबसे महत्वपूर्ण

हृदय और किडनी जैसे गंभीर रोगों में आयुर्वेद की भूमिका पर डॉ. सिंह कहते हैं कि आयुर्वेद में कई औषधियों और जीवनशैली आधारित उपायों का वर्णन है। वह कोलेस्ट्रॉल जैसी स्थितियों में अर्जुन से तैयार पारंपरिक आयुर्वेदिक योगों का उल्लेख करते हैं। लेकिन हृदय रोग, गंभीर किडनी रोग, डायलिसिस अथवा प्रत्यारोपण जैसी स्थितियों में विशेषज्ञ चिकित्सकीय निगरानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे मरीजों को अपने स्तर पर चल रहा उपचार बंद नहीं करना चाहिए। आयुर्वेदिक उपचार लेना हो तो संबंधित विशेषज्ञ और योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की निगरानी में ही आगे बढ़ना सुरक्षित है।


दवा खाते रहे, थाली नहीं बदली तो स्वास्थ्य की लड़ाई होगी मुश्किल

आयुर्वेद में ‘क्या खाएं’ के साथ ‘कैसे और कब खाएं’ भी महत्वपूर्ण माना गया है। डॉ. सिंह बताते हैं कि मरीज की बीमारी, शारीरिक प्रकृति और स्थिति के अनुसार खानपान में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए किसी दूसरे मरीज का परहेज देखकर वही नियम स्वयं पर लागू करना उचित नहीं है। चिकित्सक की सलाह के अनुसार भोजन, नियमित दिनचर्या और आवश्यक परहेज अपनाने से उपचार को बेहतर सहयोग मिल सकता है। उनके मुताबिक दवा उपचार का एक हिस्सा है, पूरी जीवनशैली नहीं।


बिगड़ती थाली का हिसाब मांग रहा लिवर, युवा भी रहें सावधान

डॉ. सिंह लिवर से जुड़ी समस्याओं को बदलती जीवनशैली से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि अत्यधिक तला-भुना और प्रसंस्कृत भोजन, अनियमित खानपान, शारीरिक निष्क्रियता तथा वजन बढ़ना लिवर के स्वास्थ्य के लिए चुनौती बन सकते हैं। फैटी लिवर जैसी स्थिति सामने आने पर केवल दवा लेकर निश्चिंत हो जाना पर्याप्त नहीं है। चिकित्सकीय सलाह के साथ वजन नियंत्रण, संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि पर ध्यान देना भी जरूरी है।

उनका कहना है कि हमारी थाली जितनी प्राकृतिक, संतुलित और नियंत्रित होगी, शरीर पर अनावश्यक बोझ उतना ही कम होगा। साफ-सफाई से तैयार भोजन और खानपान में संयम स्वस्थ जीवन की बुनियादी जरूरत है।


हर दर्द पर गोली मत खोजिए, शरीर कुछ कहना भी चाहता है

सिर दर्द हुआ तो गोली, कमर दर्द हुआ तो गोली और बदन दर्द हुआ तो फिर दर्द निवारक दवा—डॉ. सिंह इस आदत को लेकर विशेष सावधानी की बात करते हैं। उनका कहना है कि शरीर में बार-बार होने वाला दर्द किसी अंतर्निहित समस्या का संकेत भी हो सकता है। लगातार दर्द को दवा से दबाते रहने के बजाय उसके कारण का पता लगाना जरूरी है।

कुछ दर्द निवारक दवाओं का अनुचित अथवा लंबे समय तक इस्तेमाल पेट और किडनी सहित स्वास्थ्य के अन्य पहलुओं को प्रभावित कर सकता है। इसलिए बार-बार दर्द होने पर दर्द को दबाने से ज्यादा जरूरी उसके पीछे छिपे कारण को पहचानना है।


परंपरा को प्रमाण और शोध का साथ मिले तो और मजबूत होगा आयुर्वेद

आयुर्वेद के भविष्य को लेकर डॉ. सिंह का मानना है कि प्राचीन ज्ञान को आधुनिक शोध से जोड़ने की जरूरत है। औषधियों की गुणवत्ता, मानकीकरण, वैज्ञानिक अध्ययन, चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान पर जितना अधिक काम होगा, आयुर्वेद के प्रति लोगों का भरोसा उतना ही मजबूत होगा।

उनका कहना है कि आयुष व्यवस्था के माध्यम से सरकारी स्तर पर प्रयास हुए हैं, लेकिन आयुर्वेदिक चिकित्सा और अनुसंधान को जमीनी स्तर पर और सशक्त करने की गुंजाइश है। चिकित्सा पद्धतियों के बीच श्रेष्ठता की बहस के बजाय मरीज की सुरक्षा, प्रमाण आधारित उपचार और स्वास्थ्य लाभ को केंद्र में रखना अधिक जरूरी है।


‘शरीर बीमारी से पहले संकेत देता है, जरूरत उसे समय रहते सुनने की है’

करीब साढ़े तीन दशक से मरीजों को देखते आ रहे डॉ. महेश कुमार सिंह अपनी बात एक बेहद सरल संदेश के साथ समेटते हैं—स्वस्थ रहने की तैयारी बीमारी आने के बाद नहीं, उससे पहले शुरू होनी चाहिए।

संतुलित भोजन, नियमित दिनचर्या, पर्याप्त शारीरिक सक्रियता, शरीर के वजन पर नियंत्रण और समय-समय पर आवश्यक जांच स्वस्थ जीवन की मजबूत नींव बन सकती है। शरीर में लगातार दर्द, असामान्य थकान या दूसरे बदलाव दिखाई दें तो उन्हें मामूली समझकर नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

डॉ. सिंह के मुताबिक आयुर्वेद का सबसे बड़ा संदेश शायद इसी सोच में छिपा है—दवा बीमारी का उपचार कर सकती है, लेकिन स्वास्थ्य को संभालकर रखने में हमारी रोजमर्रा की आदतों की भूमिका कहीं अधिक व्यापक है।