दो साल में करीब 30 हजार दर्द पीड़ितों के उपचार का दावा, पांच हजार मरीजों को बिना ऑपरेशन राहत; युवाओं में बढ़ती कमर-गर्दन की समस्या को लेकर किया आगाह

वाराणसी। कभी कमर, गर्दन और जोड़ों के दर्द को बढ़ती उम्र की समस्या मान लिया जाता था, लेकिन बदलती जीवनशैली ने इस धारणा को पीछे छोड़ दिया है। घंटों मोबाइल पर झुकी गर्दन, कंप्यूटर के सामने लगातार बैठना, शारीरिक गतिविधियों की कमी, गलत मुद्रा और बढ़ता वजन अब कम उम्र में भी रीढ़ और मांसपेशियों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। मामूली समझकर नजरअंदाज किया गया दर्द कई बार धीरे-धीरे रोजमर्रा की जिंदगी, कामकाज और मानसिक स्थिति तक को प्रभावित करने लगता है।

दर्द क्यों बढ़ रहा है, स्लिप डिस्क आखिर है क्या, किन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और क्या हर गंभीर दिखने वाली समस्या में ऑपरेशन ही अंतिम रास्ता है? इन्हीं सवालों को लेकर परफेक्ट मिशन के प्रतिनिधि ने सिगरा-महमूरगंज स्थित डॉ. सत्यम'एस पैन हेल्थकेयर के चिकित्सक डॉ. सत्यम जायसवाल से विस्तार से बातचीत की। डॉ. जायसवाल का कहना है कि उनकी कोशिश केवल मरीज को तत्काल दर्द से राहत देने तक सीमित नहीं, बल्कि दर्द के कारण की पहचान कर उसे सामान्य जीवन में लौटने में मदद करना है। वे कहते हैं—“हमारा लक्ष्य पूर्वांचल को दर्द मुक्त बनाने की दिशा में लगातार काम करना है।” प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश...


दो साल का सफर, करीब 30 हजार मरीजों तक पहुंच

डॉ. सत्यम जायसवाल बताते हैं कि डॉ सत्यम' एस पैन हेल्थकेयर ने 16 अगस्त को अपनी दूसरी वर्षगांठ पूरी की। उनके मुताबिक इन दो वर्षों में उनकी टीम ने कमर, गर्दन, जोड़ और अन्य प्रकार के दर्द से परेशान करीब 30 हजार मरीजों का उपचार किया। उनका दावा है कि इनमें लगभग पांच हजार ऐसे मरीज भी शामिल थे, जिन्हें पहले ऑपरेशन की सलाह दी गई थी, लेकिन जांच और स्थिति के अनुरूप उपचार के जरिए उन्हें बिना ऑपरेशन राहत मिली। उनका कहना है कि प्रत्येक मरीज की स्थिति अलग होती है, इसलिए उपचार का निर्णय जांच और बीमारी की गंभीरता के आधार पर ही होना चाहिए।

इलाज के साथ जरूरतमंद तक पहुंचने की मुहिम

डॉ. जायसवाल बताते हैं कि दर्द से जूझ रहे लोगों तक चिकित्सकीय परामर्श पहुंचाने के लिए उनकी टीम समय-समय पर निशुल्क स्वास्थ्य शिविर आयोजित करती है। 16 अगस्त को आयोजित शिविर में करीब 180 लोगों को निशुल्क परामर्श दिया गया। कुछ आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराने के साथ मधुमेह सहित अन्य स्वास्थ्य जांच भी की गईं। उनका कहना है कि ऐसे शिविरों का उद्देश्य उन लोगों को भी समय रहते चिकित्सकीय सलाह से जोड़ना है, जो किसी कारण अस्पताल या क्लिनिक तक नहीं पहुंच पाते।

उम्र की सीमा तोड़ रहा दर्द, युवा भी तेजी से हो रहे प्रभावित

पहले कमर, गर्दन और जोड़ों की तकलीफें 40-50 वर्ष की उम्र के बाद अधिक देखने को मिलती थीं, लेकिन अब युवा भी बड़ी संख्या में ऐसी शिकायतों के साथ पहुंच रहे हैं। डॉ. जायसवाल इसके पीछे बदलती दिनचर्या को महत्वपूर्ण कारण मानते हैं। लंबे समय तक मोबाइल देखते हुए गर्दन झुकाए रखना, कंप्यूटर पर गलत मुद्रा में काम करना, लगातार बैठे रहना और नियमित शारीरिक गतिविधि का अभाव गर्दन, पीठ और आसपास की मांसपेशियों पर दबाव बढ़ा सकता है। उम्र के साथ रीढ़ की डिस्क और जोड़ों में स्वाभाविक बदलाव भी आते हैं, इसलिए मांसपेशियों को मजबूत रखना और सही मुद्रा अपनाना महत्वपूर्ण है।

स्लिप डिस्क : जब डिस्क का बदलाव नसों तक पहुंचाने लगे दर्द

स्लिप डिस्क को सरल भाषा में समझाते हुए डॉ. जायसवाल बताते हैं कि रीढ़ के मणकों के बीच मौजूद डिस्क गद्दी की तरह काम करती हैं और गतिविधियों के दौरान पड़ने वाले दबाव को संभालने में मदद करती हैं। जब किसी डिस्क का बाहरी हिस्सा कमजोर होकर उभरने लगे या उसके भीतर का नरम पदार्थ बाहर की ओर निकल आए तो आसपास की नसों पर दबाव पड़ सकता है। इसे हर्नियेटेड डिस्क या डिस्क प्रोलैप्स जैसी चिकित्सकीय स्थितियों से जोड़ा जाता है। उम्र के साथ डिस्क में बदलाव, भारी वजन गलत तरीके से उठाना, अचानक झटका और बार-बार पड़ने वाला अनुचित दबाव इसके जोखिम को बढ़ा सकता है।

दर्द के साथ सुन्नपन और कमजोरी हो तो संकेत को समझना जरूरी

डॉ. जायसवाल के अनुसार कमर या गर्दन के दर्द के साथ हाथ-पैर में फैलता दर्द, सुन्नपन, झनझनाहट या कमजोरी महसूस हो तो चिकित्सकीय जांच की जरूरत हो सकती है। कुछ मरीज नस के रास्ते बिजली के झटके जैसा दर्द महसूस होने की शिकायत भी करते हैं। उठने-बैठने और चलने में परेशानी बढ़ने लगे तो केवल दर्द निवारक दवाओं के सहारे समस्या को दबाने के बजाय उसके वास्तविक कारण की पहचान जरूरी है। खासकर कमजोरी तेजी से बढ़े या पेशाब-पाखाने पर नियंत्रण में बदलाव जैसे गंभीर लक्षण सामने आएं तो तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए।

डिस्क की समस्या हर मरीज में एक जैसी नहीं

डॉ. जायसवाल बताते हैं कि डिस्क में उम्र और दबाव के साथ होने वाले बदलाव अलग-अलग रूप में दिखाई दे सकते हैं। शुरुआती अवस्था में डिस्क में पानी और लचीलेपन की कमी से अकड़न या दर्द हो सकता है। कुछ स्थितियों में डिस्क बाहर की ओर उभरती है, जबकि अधिक गंभीर मामलों में उसका अंदरूनी पदार्थ बाहरी परत से बाहर निकलकर आसपास की नसों पर दबाव बना सकता है। इससे कमर से पैर तक फैलने वाला साइटिका का दर्द, सुन्नपन या कमजोरी हो सकती है। कुछ मामलों में निकला हुआ डिस्क पदार्थ अलग भी हो सकता है। हालांकि बीमारी की गंभीरता केवल किसी एक लक्षण या रिपोर्ट के शब्द से तय नहीं होती; मरीज के लक्षण, चिकित्सकीय परीक्षण और आवश्यकता के अनुसार जांच को साथ देखकर उपचार तय किया जाता है।

दर्द सिर्फ शरीर को नहीं, जिंदगी की रफ्तार को भी रोकता है

लगातार बना रहने वाला दर्द व्यक्ति को केवल शारीरिक रूप से परेशान नहीं करता। डॉ. जायसवाल कहते हैं कि लंबे समय तक दर्द रहने से नींद, काम करने की क्षमता, मनोदशा और पारिवारिक-सामाजिक जीवन तक प्रभावित हो सकता है। जब व्यक्ति ठीक से बैठ, चल या काम नहीं कर पाता तो उसकी दिनचर्या के साथ आत्मनिर्भरता भी प्रभावित होने लगती है। यही कारण है कि पुराने दर्द को केवल उम्र या थकान का परिणाम मानकर लंबे समय तक टालना उचित नहीं है।

गलत मुद्रा और निष्क्रिय दिनचर्या बढ़ा सकती है कमर की परेशानी

कमर दर्द के पीछे कई कारण हो सकते हैं। डॉ. जायसवाल के मुताबिक लंबे समय तक गलत मुद्रा में बैठना, अचानक भारी वजन उठाना, बिना तैयारी कठिन व्यायाम करना और पेट व पीठ की मांसपेशियों का कमजोर होना सामान्य कारणों में शामिल हैं। अधिक वजन भी रीढ़ पर अतिरिक्त भार बढ़ा सकता है। इसके अलावा डिस्क अथवा नस से जुड़ी समस्याएं भी कमर से पैर तक फैलने वाले दर्द का कारण बन सकती हैं। लगातार बैठकर काम करने वालों को बीच-बीच में उठने, शरीर को सक्रिय रखने और बैठने की मुद्रा पर ध्यान देने की सलाह वे महत्वपूर्ण मानते हैं।

रोज की थोड़ी सक्रियता, रीढ़ की सेहत के लिए बड़ी पूंजी

स्वस्थ शरीर के लिए डॉ. जायसवाल नियमित शारीरिक गतिविधि पर विशेष जोर देते हैं। उनका कहना है कि व्यस्त दिनचर्या में भी अपनी क्षमता के अनुसार करीब 30 मिनट पैदल चलने की आदत डालनी चाहिए। योग या साइकिल चलाना भी उपयोगी गतिविधियां हो सकती हैं, बशर्ते व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति इनके अनुकूल हो। पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है, लेकिन इसकी आवश्यकता हर व्यक्ति में वजन, मौसम, शारीरिक गतिविधि, खानपान और स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए सभी के लिए पानी की कोई एक निश्चित मात्रा तय करना उचित नहीं है।

पैसे की कमी इलाज के रास्ते में न बने दीवार

आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए डॉ. जायसवाल ने एक नई पहल की जानकारी भी दी। उन्होंने बताया कि सत्यम क्लिनिक अगले महीने से प्रत्येक माह की पहली तारीख को निशुल्क परामर्श देने की व्यवस्था शुरू करेगा। उनका कहना है कि आर्थिक परेशानी के कारण फीस या दवा का खर्च वहन नहीं कर पाने वाले जरूरतमंद मरीजों को यथासंभव सहायता देने का प्रयास किया जाता है। परिस्थितियों के अनुसार निशुल्क उपचार और दवाओं में मदद भी की जाती है। उनका मानना है कि आर्थिक कमजोरी किसी जरूरतमंद को आवश्यक चिकित्सकीय परामर्श से वंचित करने की वजह नहीं बननी चाहिए।

दर्द को आदत न बनाएं, शरीर के संकेतों को समय रहते समझें

बातचीत के अंत में डॉ. सत्यम जायसवाल का संदेश बेहद स्पष्ट है—शरीर में लगातार होने वाले दर्द को सामान्य मानकर उसके साथ जीने की आदत नहीं डालनी चाहिए। कमर, गर्दन, जोड़ या शरीर के किसी हिस्से में दर्द बार-बार लौट रहा हो, लगातार बढ़ रहा हो अथवा रोजमर्रा की गतिविधियों को प्रभावित करने लगा हो तो समय रहते चिकित्सकीय सलाह जरूरी है। सही मुद्रा, नियमित शारीरिक गतिविधि, वजन पर नियंत्रण और संतुलित दिनचर्या रीढ़ व जोड़ों की सेहत को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वे कहते हैं—“दर्द के साथ जीने की आदत मत डालिए। उसके कारण को समझिए और समय रहते सही उपचार कराइए। हमारा प्रयास है कि पूर्वांचल में दर्द से जूझ रहे अधिक से अधिक लोगों तक सही सलाह और उपचार पहुंचे।”