वाराणसी। वाराणसी खण्ड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस समर्थित एमएलसी प्रत्याशी एवं महामना मदन मोहन इंटर कॉलेज, संकट मोचन के प्रधानाचार्य संजय राय प्रियदर्शी इन दिनों अपने अनूठे चुनावी अभियान और वित्तविहीन शिक्षकों के मुद्दों को लेकर चर्चा में हैं। वर्षों से उपेक्षित वित्तविहीन शिक्षकों की समस्याओं को लेकर मुखर रहे संजय राय प्रियदर्शी ने "परफेक्ट मिशन" से विशेष बातचीत में अपने चुनावी विजन, अभियान की रणनीति और शिक्षकों के अधिकारों की लड़ाई को लेकर विस्तार से चर्चा की।
आपके चुनावी अभियान का मुख्य उद्देश्य क्या है?
संजय राय प्रियदर्शी: मेरा चुनाव किसी पद या प्रतिष्ठा के लिए नहीं, बल्कि वित्तविहीन शिक्षकों के सम्मान और अधिकारों की लड़ाई के लिए है। वर्षों से वित्तविहीन शिक्षक शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ बने हुए हैं, लेकिन उन्हें न तो सम्मानजनक मानदेय मिला और न ही सामाजिक सुरक्षा। मेरा स्पष्ट मानना है कि "वादा नहीं, अधिकार चाहिए – वित्तविहीन शिक्षकों को सम्मान चाहिए।" यही हमारे पूरे अभियान का मूल मंत्र है।
आप बार-बार वित्तविहीन शिक्षकों की पीड़ा की बात करते हैं। आखिर उनकी सबसे बड़ी समस्या क्या है?
संजय राय प्रियदर्शी: सबसे बड़ी समस्या यह है कि वित्तविहीन शिक्षक अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय शिक्षा के लिए समर्पित कर देते हैं, लेकिन उनके भविष्य की कोई सुरक्षा नहीं है। कई शिक्षक वर्षों से अल्प मानदेय पर कार्य कर रहे हैं। उनके सामने आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक चुनौतियां हैं। दुख की बात यह है कि चुनाव के समय उनके मुद्दे उठाए जाते हैं, लेकिन बाद में उन्हें भुला दिया जाता है।
यदि आप एमएलसी बनते हैं तो आपकी प्राथमिकताएं क्या होंगी?
संजय राय प्रियदर्शी: मेरी पहली प्राथमिकता वित्तविहीन शिक्षकों के लिए सम्मानजनक मानदेय की व्यवस्था सुनिश्चित करने की होगी। इसके साथ ही मैं सेवा सुरक्षा, चिकित्सा सुविधाओं और सामाजिक सुरक्षा के मुद्दों को मजबूती से उठाऊंगा। मैं चाहता हूं कि शिक्षक केवल जीविका की चिंता न करें, बल्कि पूरी ऊर्जा के साथ राष्ट्र निर्माण में योगदान दें।
आपका चुनावी अभियान अन्य प्रत्याशियों से अलग कैसे है?
संजय राय प्रियदर्शी: हम केवल भाषण और पोस्टर तक सीमित नहीं हैं। हमने कई नए अभियान शुरू किए हैं।
"एक चॉक, एक संकल्प" अभियान
इस अभियान के तहत प्रत्येक शिक्षक को एक चॉक और एक संकल्प पत्र दिया जा रहा है। इसका संदेश है कि जिस चॉक से शिक्षक भविष्य गढ़ता है, उसी शिक्षक के भविष्य को सुरक्षित करना हमारा संकल्प है।
"मेरी कहानी, मेरा संघर्ष" अभियान
इसमें वित्तविहीन शिक्षकों की संघर्ष गाथाओं को वीडियो और सोशल मीडिया के माध्यम से समाज के सामने लाया जा रहा है ताकि लोगों को उनकी वास्तविक स्थिति का पता चल सके।
"शिक्षक संसद"
हर जिले में शिक्षकों की बैठक आयोजित की जा रही है, जहां शिक्षक खुलकर अपनी समस्याएं और सुझाव रख रहे हैं। हमारा मानना है कि नीति निर्माण तभी प्रभावी होगा जब शिक्षक स्वयं उसकी दिशा तय करें।
"एक दिन शिक्षक के साथ"
मैं स्वयं विभिन्न विद्यालयों में जाकर शिक्षकों के साथ समय बिता रहा हूं ताकि उनकी वास्तविक समस्याओं को समझ सकूं। मैं केवल मंच से बातें करने में विश्वास नहीं रखता, बल्कि जमीन पर जाकर समस्याओं का समाधान खोजने में विश्वास करता हूं।
आपके विरोधी कहते हैं कि चुनाव के समय ही शिक्षकों की याद आती है। आप क्या कहेंगे?
संजय राय प्रियदर्शी: मैं वर्षों से वित्तविहीन विद्यालयों और शिक्षकों के बीच काम कर रहा हूं। मैं स्वयं वित्तविहीन शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों को करीब से समझता हूं। इसलिए यह लड़ाई मेरे लिए चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन का मिशन है। मैं शिक्षकों से यही कहता हूं कि वे केवल वादों पर भरोसा न करें, बल्कि पिछले कार्यों और संघर्षों का हिसाब मांगें।
आपके प्रचार अभियान का सबसे बड़ा संदेश क्या है?
संजय राय प्रियदर्शी: हमारा संदेश बिल्कुल स्पष्ट है – "जो वित्तविहीन शिक्षकों की पीड़ा समझेगा, वही उनका सही प्रतिनिधित्व कर सकेगा।" हम शिक्षकों के बीच विश्वास, सम्मान और अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं। अब समय आ गया है कि शिक्षक समाज एकजुट होकर अपनी आवाज को मजबूत करे।
युवाओं और महिला शिक्षकों के लिए आपकी क्या योजना है?
संजय राय प्रियदर्शी: युवा शिक्षक शिक्षा व्यवस्था की नई ऊर्जा हैं और महिला शिक्षक समाज की शक्ति। हम उनके लिए अलग संवाद कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। उनकी समस्याओं और सुझावों को भी अपने घोषणा पत्र में शामिल कर रहे हैं।
अंत में शिक्षक समाज को क्या संदेश देना चाहेंगे?
संजय राय प्रियदर्शी: मैं सभी शिक्षकों से कहना चाहता हूं कि यह चुनाव केवल एक प्रतिनिधि चुनने का अवसर नहीं, बल्कि अपने सम्मान और अधिकार की लड़ाई को नई दिशा देने का अवसर है। यदि शिक्षक समाज एकजुट होकर अपने मुद्दों पर मतदान करेगा, तो निश्चित रूप से परिवर्तन संभव है।
मैं फिर दोहराना चाहता हूं—
"वादा नहीं, अधिकार चाहिए – वित्तविहीन शिक्षकों को सम्मान चाहिए।"
"जो शिक्षक का दर्द जानता है, वही शिक्षक का नेतृत्व कर सकता है।
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