वाराणसी। बच्चे बोलना सीख जाते हैं, चलना सीख जाते हैं, मुस्कुराना सीख जाते हैं, लेकिन कई बार वे यह नहीं बता पाते कि उनकी दुनिया धुंधली दिखाई दे रही है। यही वजह है कि आंखों की कुछ बीमारियां बिना किसी शोर के धीरे-धीरे बच्चे के भविष्य की रोशनी को कमजोर करती रहती हैं। इन्हीं में सबसे गंभीर और सबसे कम समझी जाने वाली बीमारी है लेज़ी आई (एम्ब्लियोपिया)। यह केवल आंखों की कमजोरी नहीं, बल्कि आंख और मस्तिष्क के बीच बनने वाले उस अदृश्य रिश्ते की कमजोरी है, जिस पर पूरी जिंदगी की दृष्टि निर्भर करती है। अर्दली बाजार स्थित काशी नेत्रालय में बाल नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. करिश्मा अग्रवाल प्रतिदिन ऐसे बच्चों का उपचार करती हैं, जिनकी आंखें तो स्वस्थ दिखती हैं, लेकिन उनकी दृष्टि धीरे-धीरे साथ छोड़ रही होती है। उनके कक्ष में लगी जांच संबंधी आधुनिक व्यवस्थाएं और बच्चों के प्रति उनका आत्मीय व्यवहार इस विश्वास को मजबूत करता है कि समय पर पहचान ही इस बीमारी पर सबसे बड़ी जीत है। परफेक्ट मिशन के प्रतिनिधि ने उनसे इस गंभीर विषय पर विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश—
बच्चे की चुप्पी में छिपा है खतरा, शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज किया तो बढ़ सकती है लेज़ी आई
डॉ. करिश्मा अग्रवाल बताती हैं कि लेज़ी आई की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यह बीमारी अक्सर बिना किसी स्पष्ट शिकायत के चुपचाप बढ़ती रहती है। अधिकांश बच्चे अपनी दृष्टि संबंधी परेशानी को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि उन्हें लगता है कि दुनिया जैसी उन्हें दिखाई दे रही है, वैसी ही सभी को दिखाई देती होगी। यही कारण है कि अभिभावक भी शुरुआती संकेतों को सामान्य समझकर अनदेखा कर देते हैं और बीमारी धीरे-धीरे गंभीर रूप ले लेती है। वह स्पष्ट करती हैं कि लेज़ी आई केवल आंखों की नहीं, बल्कि आंख और मस्तिष्क के बीच बनने वाले दृष्टि-संबंध की समस्या है। जब एक आंख से मस्तिष्क तक स्पष्ट चित्र नहीं पहुंचता, तो मस्तिष्क धीरे-धीरे उसी आंख के संकेतों को स्वीकार करना बंद कर देता है। यदि समय रहते इसकी पहचान और उपचार न किया जाए, तो यही स्थिति आगे चलकर स्थायी दृष्टि हानि का कारण बन सकती है। उनका संदेश स्पष्ट है— "यदि बच्चा आंखें मिचमिचाकर देखता है, एक आंख बंद करके चीजों को देखने की कोशिश करता है या देखने में किसी प्रकार की असामान्यता दिखाई देती है, तो इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज न करें। समय पर कराई गई नेत्र जांच ही लेज़ी आई जैसी खामोश बीमारी को बढ़ने से रोक सकती है और बच्चे की आंखों की रोशनी सुरक्षित रख सकती है।"
जब मस्तिष्क कमजोर आंख को नजरअंदाज करने लगता है, तभी शुरू होती है लेज़ी आई
डॉ. करिश्मा अग्रवाल बताती हैं कि लेज़ी आई को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि हमारी आंखें केवल देखने का माध्यम हैं, जबकि वास्तव में देखने का काम मस्तिष्क करता है। मस्तिष्क हमेशा उसी आंख से आने वाले चित्र को प्राथमिकता देता है, जो सबसे स्पष्ट दिखाई देता है। यदि किसी बच्चे की एक आंख में अधिक नंबर हो, आंख टेढ़ी हो, जन्मजात मोतियाबिंद हो या किसी अन्य कारण से वह आंख साफ़ चित्र न भेज पा रही हो, तो मस्तिष्क धीरे-धीरे उसी आंख के संकेतों को नजरअंदाज कर स्वस्थ आंख पर पूरी तरह निर्भर हो जाता है। समय के साथ कमजोर आंख निष्क्रिय होने लगती है और यही स्थिति एम्ब्लियोपिया (लेज़ी आई) कहलाती है। वह स्पष्ट करती हैं कि इस बीमारी का उपचार केवल आंख का नहीं, बल्कि आंख और मस्तिष्क के बीच कमजोर पड़ चुके दृष्टि-समन्वय को दोबारा मजबूत बनाने का होता है। उनका संदेश स्पष्ट है— "लेज़ी आई को केवल आंखों की कमजोरी समझने की भूल न करें। समय पर सही उपचार से आंख और मस्तिष्क के बीच टूट रहे संबंध को फिर से सक्रिय किया जा सकता है और बच्चे की दृष्टि को बेहतर बनाया जा सकता है।"
छोटे-छोटे संकेतों को नजरअंदाज न करें, यही हो सकते हैं लेज़ी आई की पहली चेतावनी
डॉ. करिश्मा अग्रवाल कहती हैं कि लेज़ी आई की पहचान कई बार बच्चे की रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों और व्यवहार में छिपी होती है। यदि बच्चा टीवी बहुत पास बैठकर देखता है, पढ़ते समय किताब को चेहरे से सटा लेता है, बार-बार आंखें मलता है, एक आंख बंद करके देखने की कोशिश करता है, खेलते समय दूरी का सही अनुमान नहीं लगा पाता या स्कूल में ब्लैकबोर्ड पढ़ने में कठिनाई महसूस करता है, तो इन्हें केवल सामान्य आदत मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई मामलों में आंख का हल्का टेढ़ापन भी लेज़ी आई की शुरुआती चेतावनी हो सकता है। डॉ. अग्रवाल के अनुसार ऐसे संकेत इस बात का इशारा हो सकते हैं कि बच्चे की एक आंख सामान्य रूप से काम नहीं कर रही है और उसे तत्काल नेत्र विशेषज्ञ को दिखाने की आवश्यकता है। उनका संदेश स्पष्ट है— "बच्चों की छोटी-छोटी आंखों संबंधी परेशानियां भविष्य में बड़ी समस्या का रूप ले सकती हैं। यदि ऐसे कोई भी संकेत दिखाई दें, तो बिना देर किए नेत्र परीक्षण कराएं, क्योंकि समय पर पहचान ही लेज़ी आई से बच्चे की दृष्टि बचाने की सबसे बड़ी कुंजी है।"
एक साधारण जांच बचा सकती है बच्चे की जिंदगीभर की रोशनी
डॉ. करिश्मा अग्रवाल कहती हैं कि कई बार केवल एक समय पर कराया गया नेत्र परीक्षण ही बच्चे की पूरी जिंदगी की दृष्टि सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त साबित होता है। उनके अनुसार लेज़ी आई जैसी समस्याएं शुरुआती अवस्था में अक्सर बिना किसी स्पष्ट शिकायत के विकसित होती हैं, इसलिए नियमित आंखों की जांच बेहद आवश्यक है। बीमारी जितनी जल्दी पहचान में आएगी, उपचार उतनी ही जल्दी शुरू होगा और दोनों आंखों की सामान्य दृष्टि विकसित होने की संभावना भी उतनी अधिक रहेगी। वह बताती हैं कि यही कारण है कि हर बच्चे की कम उम्र में नियमित नेत्र जांच को उतनी ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जितनी टीकाकरण और सामान्य स्वास्थ्य परीक्षण को दी जाती है। उनका संदेश स्पष्ट है— "बच्चे की आंखों की जांच को कभी सामान्य प्रक्रिया समझकर टालिए मत। कुछ मिनट की यह जांच उसके पूरे जीवन की रोशनी, शिक्षा, आत्मविश्वास और भविष्य को सुरक्षित रखने का सबसे महत्वपूर्ण कदम बन सकती है।"
लेज़ी आई का इलाज सिर्फ चश्मा नहीं, वैज्ञानिक उपचार से लौट सकती है आंखों की रोशनी
डॉ. करिश्मा अग्रवाल बताती हैं कि लेज़ी आई का उपचार प्रत्येक बच्चे की स्थिति, उम्र और दृष्टि की गंभीरता को ध्यान में रखकर तय किया जाता है। उपचार की शुरुआत आमतौर पर सही नंबर का चश्मा लगाने से होती है, ताकि आंखों को स्पष्ट दृष्टि मिल सके। यदि आवश्यकता हो, तो इसके बाद पैचिंग थेरेपी अपनाई जाती है, जिसमें कुछ समय के लिए स्वस्थ आंख को ढक दिया जाता है। इससे कमजोर आंख अधिक सक्रिय होकर काम करने लगती है और मस्तिष्क धीरे-धीरे उसके संकेतों को दोबारा स्वीकार करने लगता है। इसके साथ विजन थेरेपी भी कराई जाती है, जो आंख और मस्तिष्क के बीच समन्वय को मजबूत बनाती है और देखने की क्षमता में सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। डॉ. अग्रवाल का कहना है कि यह पूरी उपचार प्रक्रिया वैज्ञानिक शोधों पर आधारित है और यदि समय रहते शुरू कर दी जाए, तो अधिकांश बच्चों में अत्यंत उत्साहजनक और सफल परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। उनका संदेश स्पष्ट है— "लेज़ी आई का इलाज संभव है, बशर्ते सही समय पर सही उपचार शुरू किया जाए। जितनी जल्दी इलाज होगा, उतनी ही अधिक संभावना होगी कि बच्चे की दृष्टि सामान्य रूप से विकसित हो सके।"
लेज़ी आई की सबसे बड़ी दवा है ‘समय’, देर करना पड़ सकता है भारी
डॉ. करिश्मा अग्रवाल विशेष जोर देते हुए कहती हैं कि लेज़ी आई के उपचार में सबसे प्रभावी दवा कोई दवाई नहीं, बल्कि समय पर शुरू किया गया इलाज है। उनके अनुसार यदि सात से आठ वर्ष की आयु से पहले उपचार शुरू कर दिया जाए, तो दृष्टि में सुधार की संभावना सबसे अधिक रहती है। हालांकि चिकित्सा विज्ञान में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां किशोरावस्था तक भी उपचार से सकारात्मक परिणाम मिले हैं, लेकिन इलाज जितना देर से शुरू होगा, आंख की खोई हुई दृष्टि को पूरी तरह वापस लाने की संभावना उतनी ही कम होती जाएगी। वह अभिभावकों से अपील करती हैं कि बच्चे की आंखों से जुड़ी किसी भी असामान्यता को नजरअंदाज न करें, क्योंकि लेज़ी आई में इंतजार करना ही सबसे बड़ी गलती साबित हो सकता है। उनका संदेश स्पष्ट है— "समय पर पहचान और तुरंत शुरू किया गया उपचार ही लेज़ी आई पर जीत की सबसे मजबूत कुंजी है। जितनी जल्दी कदम उठाएंगे, बच्चे की आंखों की रोशनी और उसका भविष्य उतना ही सुरक्षित रहेगा।"
दवा के साथ पोषण भी जरूरी, स्वस्थ आंखों की असली नींव है संतुलित आहार
डॉ. करिश्मा अग्रवाल बताती हैं कि बच्चों की आंखों की बेहतर रोशनी केवल चश्मे, दवा या उपचार पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसकी मजबूत बुनियाद सही पोषण से तैयार होती है। उनके अनुसार विटामिन-ए रेटिना के विकास, आंखों की कार्यक्षमता और दृष्टि को स्वस्थ बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गर्भावस्था के दौरान मां का संतुलित एवं पौष्टिक भोजन तथा जन्म के बाद बच्चे को पोषण से भरपूर आहार देना उसकी आंखों के समुचित विकास के लिए बेहद आवश्यक है। वह चेतावनी देती हैं कि विटामिन-ए की कमी कई गंभीर नेत्र समस्याओं का कारण बन सकती है। इसलिए अभिभावकों को बच्चों के दैनिक भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियां, दूध, अंडा, गाजर, पपीता और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ अवश्य शामिल करने चाहिए, क्योंकि स्वस्थ भोजन ही स्वस्थ दृष्टि और उज्ज्वल भविष्य की सबसे मजबूत आधारशिला है।
क्या एक उम्र के बाद लेज़ी आई का इलाज संभव नहीं? जानिए सच
डॉ. करिश्मा अग्रवाल लेज़ी आई को लेकर समाज में फैली इस आम भ्रांति को दूर करते हुए कहती हैं कि अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि एक निश्चित उम्र के बाद लेज़ी आई (एम्ब्लियोपिया) का इलाज संभव नहीं होता, जबकि यह पूरी तरह सही नहीं है। उनके अनुसार शुरुआती बचपन उपचार के लिए सबसे उपयुक्त समय अवश्य होता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बाद की उम्र में इलाज का कोई लाभ नहीं मिलता। चिकित्सा विज्ञान में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां किशोरावस्था तक भी उपचार से उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। इसलिए यदि किसी बच्चे में देर से भी लेज़ी आई की पहचान होती है, तो घबराने या उपचार से पीछे हटने के बजाय तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। उनका कहना है कि सही समय पर शुरू किया गया उपचार, नियमित फॉलो-अप और अभिभावकों का सहयोग कई बार उम्मीद से कहीं बेहतर परिणाम देता है। उनका संदेश स्पष्ट है— "लेज़ी आई के इलाज में देर होना अंत नहीं है। सबसे जरूरी है सही समय पर सही विशेषज्ञ तक पहुंचना। हर बच्चे की आंखों में बेहतर देखने की संभावना छिपी होती है, जरूरत केवल उसे समय रहते पहचानने और उपचार का पूरा अवसर देने की है।"
आंखों की रोशनी ही नहीं, सपनों की भी सुरक्षा कीजिए
डॉ. करिश्मा अग्रवाल की आवाज़ में एक चिकित्सक की विशेषज्ञता के साथ-साथ बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की गहरी चिंता भी साफ झलकती है। वह कहती हैं कि बच्चों की आंखें केवल दुनिया को देखने का माध्यम नहीं, बल्कि उनके सपनों, सीखने की क्षमता और सुनहरे भविष्य की पहली खिड़की हैं। यदि अभिभावक थोड़ी-सी सजगता दिखाएं, समय-समय पर नेत्र परीक्षण कराएं और लेज़ी आई के शुरुआती संकेतों को नज़रअंदाज़ न करें, तो हजारों बच्चों को जीवनभर की दृष्टि संबंधी समस्याओं से बचाया जा सकता है। उनका भावपूर्ण संदेश है— "लेज़ी आई एक खामोश चुनौती जरूर है, लेकिन समय पर पहचान, सही उपचार और अभिभावकों की जागरूकता से इस पर पूरी तरह विजय पाई जा सकती है। बच्चे की आंखों की जांच को कभी टालिए मत, क्योंकि आज उठाया गया एक छोटा-सा कदम उसके पूरे जीवन और भविष्य को नई रोशनी दे सकता है।"
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