वाराणसी। राजस्थान की ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक एवं सांस्कृतिक विरासत तथा उसमें समय के साथ आए परिवर्तनों पर केंद्रित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘राजस्थान : पुरातनता और परिवर्तन’ का शुभारंभ शुक्रवार को काशी हिंदू विश्वविद्यालय स्थित वैदिक विज्ञान केंद्र में हुआ। वाराणसी इंस्टीट्यूट ऑफ हिस्ट्री द्वारा आयोजित संगोष्ठी में देश-विदेश से आए इतिहासकारों, शोधार्थियों एवं विद्वानों ने राजस्थान की विरासत के विविध पक्षों पर विचार-विमर्श किया।

उद्घाटन अवसर पर संस्थापक निदेशक एमेरिटस प्रो. अरुणा सिन्हा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि राजस्थान का अतीत उसकी सांस्कृतिक निरंतरता और वर्तमान सामाजिक परिवर्तनों को समझने का महत्वपूर्ण आधार है। उन्होंने कहा कि ऐसे अकादमिक आयोजन शोध की नई दिशाओं के साथ विद्वानों के बीच ज्ञान-संवाद को मजबूत करते हैं।

मुख्य अतिथि हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविंदर गुप्ता ने राजस्थान की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और उसे भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया। मुख्य वक्ता इतिहासकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू ने राजस्थान के ऐतिहासिक स्रोतों, साहित्यिक परंपराओं और स्मारकीय विरासत के गंभीर अध्ययन को आवश्यक बताया।

बेल्जियम के भारतविद् डॉ. कोएनराड एल्स्ट ने भारतीय इतिहास, परंपरा एवं सांस्कृतिक निरंतरता पर विचार रखे। प्रख्यात भूगोलवेत्ता प्रो. राणा पी.बी. सिंह ने राजस्थान के सांस्कृतिक भू-दृश्य, स्थापत्य एवं मानव-पर्यावरण संबंधों पर प्रकाश डाला। अध्यक्षीय संबोधन में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी के निदेशक डॉ. अभिजीत दीक्षित ने भारतीय कला एवं विरासत के संरक्षण और अकादमिक दस्तावेजीकरण की आवश्यकता बताई।

संगोष्ठी में राजस्थान की पुरातात्त्विक, ऐतिहासिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं भौगोलिक विरासत पर शोधपरक विमर्श हुआ। संचालन डॉ. जयलक्ष्मी कौल ने किया, जबकि डॉ. श्रेया पाठक ने धन्यवाद ज्ञापित किया। उद्घाटन सत्र में देश-विदेश से आए बड़ी संख्या में विद्वान, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।