वाराणसी। एक ओर हर-हर महादेव का उद्घोष, दूसरी ओर हाथों में लहराता तिरंगा और सामने अविरल बहती मां गंगा…। श्रावण शिवरात्रि पर मंगलवार को दशाश्वमेध घाट पर आस्था, राष्ट्रभक्ति और प्रकृति प्रेम का ऐसा संगम दिखाई दिया, जिसने काशी की आध्यात्मिक चेतना को एक नया संदेश दिया। कांवड़ में गंगाजल भरकर बाबा विश्वनाथ के अभिषेक को आतुर हजारों शिवभक्तों के बीच नमामि गंगे ने मां गंगा की आरती उतारी और श्रद्धालुओं को राष्ट्रभक्ति, सेवा, स्वच्छता, जल संरक्षण एवं पर्यावरण संवर्धन का संकल्प दिलाया।

नमामि गंगे काशी क्षेत्र के संयोजक एवं नगर निगम के स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर राजेश शुक्ला के संयोजन में ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के तहत राष्ट्रध्वज लेकर आयोजित इस कार्यक्रम ने श्रावण की शिवभक्ति को प्रकृति और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी से जोड़ दिया। श्रद्धालुओं से आह्वान किया गया कि श्रावण केवल भगवान शिव की आराधना का महीना नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति अपने ऋण को समझने और उसे लौटाने का भी अवसर है। “हर बूंद का सम्मान हो, हर पौधे का संरक्षण हो और प्रकृति से जितना लें, उतना उसे लौटाने का संकल्प हो”, इसी संदेश के साथ शिवभक्तों को सेवा, स्वच्छता और सामाजिक सहभागिता की राह पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया गया। राजेश शुक्ला ने कहा कि देवाधिदेव महादेव स्वयं प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का सबसे विराट संदेश देते हैं। 

उनकी जटाओं में मां गंगा, मस्तक पर चंद्रमा, कंठ में सर्प, साथ में नंदी और गण—शिव का पूरा स्वरूप मनुष्य और प्रकृति के अटूट रिश्ते का प्रतीक है। सनातन संस्कृति का यही प्रकृति बोध हमें बताता है कि शिव की आराधना केवल जलाभिषेक तक सीमित नहीं, बल्कि जल, जंगल, जीव और धरती की रक्षा भी शिवभक्ति का ही विस्तार है। दशाश्वमेध घाट पर जब श्रद्धालुओं ने मां गंगा के सामने स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया तो यह आयोजन महज एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति बचाने का संदेश बन गया।

कांवड़ में भरा गंगाजल आस्था का प्रतीक था तो हाथों में लहराता तिरंगा राष्ट्र के प्रति समर्पण का। श्रावण शिवरात्रि पर काशी ने मानो एक स्वर में संदेश दिया—महादेव की आराधना तभी सार्थक होगी, जब उनकी जटाओं से निकली गंगा निर्मल रहे और उनकी बनाई प्रकृति सुरक्षित रहे। आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और कांवड़िये शामिल हुए।