प्रयागराज। आद्या जगतगुरु शंकराचार्य त्रिकाल भवता सरस्वती ने महिलाओं के सम्मान, धार्मिक संस्थाओं में समान भागीदारी और शंकराचार्य पद पर महिलाओं की भूमिका को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि भारतीय सनातन परंपरा में नारी को शक्ति का स्वरूप माना गया है। ऐसे में धार्मिक व्यवस्थाओं में महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि भगवान शिव भी शक्ति के बिना पूर्ण नहीं माने जाते। नारी और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं। जब सनातन धर्म में नारी को देवी, शक्ति और जगतजननी का स्वरूप माना गया है तो धार्मिक नेतृत्व और महत्वपूर्ण निर्णयों में महिलाओं को समान अवसर क्यों नहीं मिलना चाहिए।
शंकराचार्य ने राम मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक संस्थानों में चंदे और व्यवस्थाओं को लेकर भी पारदर्शिता की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं द्वारा आस्था से दिया गया दान समाज और धर्महित में पूरी पारदर्शिता के साथ उपयोग होना चाहिए। धार्मिक संस्थाओं की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें किसी वर्ग के साथ भेदभाव की गुंजाइश न रहे।
उन्होंने सवाल उठाया कि देश में विभिन्न पीठों की धार्मिक परंपराओं और नेतृत्व व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी सीमित क्यों है। यदि महिलाएं शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, विज्ञान और सामाजिक क्षेत्र में नेतृत्व कर सकती हैं तो धार्मिक क्षेत्र में उन्हें समान सम्मान और अवसर देने पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि महिलाओं को केवल सम्मान के शब्दों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें निर्णय लेने और धार्मिक नेतृत्व में भी उचित स्थान दिया जाना चाहिए। समाज में आधी आबादी महिलाओं की है और उनके अधिकारों, सम्मान तथा गरिमा को सुनिश्चित करना सभी की जिम्मेदारी है।
उन्होंने तमाम मुद्दों पर चर्चा करते हुए कहा कि सनातन परंपरा की मूल भावना समानता, सम्मान और समरसता की है। इसलिए समय के साथ धार्मिक व्यवस्थाओं में भी महिलाओं की भूमिका और अधिकारों पर गंभीर एवं सकारात्मक विमर्श होना आवश्यक है।:::
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