बेटावर में लाखों का सरकारी निर्माण बदहाल, टूटी चहारदीवारी और सिकुड़ा घाट खोल रहा व्यवस्था की पोल; बाढ़ को एक साल बीता, जिम्मेदारों ने नहीं हटाई गाद
रोहनिया (वाराणसी)। जिस मुक्तिधाम में लोग अपनों को अंतिम विदाई देने आते हैं, बेटावर गांव में वही मुक्तिधाम सरकारी उपेक्षा का जीता-जागता उदाहरण बन गया है। लाखों रुपये खर्च कर बनाए गए इस मुक्तिधाम में दो फीट ऊंची मिट्टी में शौचालय और स्नानघर दबे पड़े हैं, चहारदीवारी टूट चुकी है और रास्ता कीचड़ से लथपथ है। यानी यहां मौत के बाद भी परिजनों की मुसीबत खत्म नहीं होती।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बाढ़ को करीब एक साल बीत गया, लेकिन शौचालयों से मिट्टी हटाने की फुर्सत जिम्मेदारों को अब तक क्यों नहीं मिली? सरकारी धन से बने इस सार्वजनिक स्थल की हालत देखकर साफ है कि निर्माण के बाद इसके रखरखाव को जैसे भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है।
बाढ़ का पानी उतर गया, जिम्मेदारों की ‘सुस्ती’ नहीं
पिछले वर्ष गंगा में आई बाढ़ के दौरान मुक्तिधाम के शौचालयों और स्नानघरों में मिट्टी और गाद भर गई थी। पानी उतर गया, मौसम बदल गए, लेकिन करीब दो फीट ऊंची मिट्टी आज भी वहीं जमी है।
नतीजा यह कि शौचालय और स्नानघर उपयोग के लायक नहीं बचे। अंतिम संस्कार में शामिल होने वाले लोगों को जरूरी सुविधाओं के लिए इधर-उधर भटकना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि शिकायतें कई बार हुईं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ आश्वासन ही मिला।
कंधे पर शव, पैरों के नीचे कीचड़
बारिश ने मुक्तिधाम तक पहुंचने वाले रास्ते की हालत और खराब कर दी है। कीचड़ और फिसलन के बीच शव लेकर चलना परिजनों के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं है। अंतिम यात्रा में शामिल बुजुर्गों की परेशानी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जहां आखिरी सफर सम्मानजनक होना चाहिए, वहां कदम-कदम पर फिसलने का खतरा है
गंगा का जलस्तर बढ़ने से घाट का दायरा भी सिमट गया है। पानी और कीचड़ के बीच दाह संस्कार के लिए जगह पर पहुंचने में भी मुश्किल हो रहा है।
चहारदीवारी भी टूटी, व्यवस्था की ‘दीवार’ भी
मुक्तिधाम की चहारदीवारी कई जगह टूटकर गिर चुकी है। इससे परिसर की सुरक्षा और रखरखाव पर सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि लाखों रुपये खर्च करने के बाद इसके रखरखाव पर जिम्मेदारों का ध्यान नहीं है।
टूटी चहारदीवारी, मिट्टी में दबे शौचालय और कीचड़ में तब्दील रास्ता—तीनों तस्वीरें एक ही सवाल पूछ रही हैं कि आखिर सरकारी व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है?
केयरटेकर ने कहा- शिकायत करते-करते थक गए
मुक्तिधाम के केयरटेकर मनोज के मुताबिक बाढ़ के बाद से ही शौचालय और स्नानघरों में मिट्टी जमा है। ग्राम प्रधान से कई बार सफाई कराने की मांग की गई, लेकिन अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
प्रधान ने जिम्मेदारी बांटकर पल्ला झाड़ा!
ग्राम प्रधान हरीश चंद्र ने कहा कि बाढ़ के कारण शौचालय और स्नानघरों में मिट्टी भर गई थी। उन्होंने मुक्तिधाम पर रहने और काम करने वालों को भी सफाई की जिम्मेदारी निभाने की बात कही।
प्रधान का यह तर्क ग्रामीणों को रास नहीं आ रहा। उनका कहना है कि सरकारी धन से बने सार्वजनिक स्थल की व्यवस्था दुरुस्त रखना किसकी जिम्मेदारी है, इसका जवाब जिम्मेदारों को देना चाहिए।
अब प्रशासन की बारी- आखिर कब जागेगा प्रशासन?
ग्रामीणों ने जिलाधिकारी और ब्लॉक प्रशासन से तत्काल निरीक्षण कराने की मांग की है। लोगों की मांग है कि शौचालयों और स्नानघरों से जमा मिट्टी-गाद हटाई जाए, टूटी चहारदीवारी की मरम्मत हो और मुक्तिधाम तक पक्का रास्ता बनाया जाए।
बेटावर का मुक्तिधाम सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि लोगों की अंतिम यात्रा से जुड़ा संवेदनशील स्थल है। यहां महीनों तक मूलभूत सुविधाएं बदहाल रहना महज लापरवाही नहीं, बल्कि जिम्मेदार व्यवस्था पर गंभीर सवाल है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस बदहाली को भी ‘कागजी कार्रवाई’ में दफन करता है या मौके पर पहुंचकर व्यवस्था को सच में जिंदा करता है।
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