वाराणसी। सावन की आहट से पहले गुरुवार की सुनहरी सुबह काशी ने एक ऐसा अलौकिक दृश्य देखा, जिसने हर श्रद्धालु के मन को भक्ति से भर दिया। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं बाबा विश्वनाथ अपनी प्रिय नगरी को भगवान जगन्नाथ के स्वागत में पुरी का स्वरूप प्रदान कर रहे हों। सूर्योदय की पहली किरण के साथ गूंजते वैदिक मंत्र, जगन्नाथ प्रभु की मंगल आरती, पुष्पों से सुसज्जित दिव्य रथ और श्रद्धा से उमड़ा जनसैलाब... यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति, सेवा और प्रकृति के अद्भुत मिलन का जीवंत उत्सव था।
नमामि गंगे और अन्नपूर्णा सामाजिक सेवा समिति ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की आरती उतारकर लोककल्याण, निर्मल गंगा, आत्मनिर्भर भारत और जन-जन के आरोग्य की मंगलकामना की। "नीलांचल निवासाय नित्याय परमात्मने, बलभद्र सुभद्राभ्याम् जगन्नाथाय ते नमः..." के मंत्रोच्चार से पूरी काशी भक्तिरस में सराबोर हो उठी। अष्टकोणीय पीतवर्ण रथ पर विराजमान भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भैया बलभद्र को प्रिय नानखटाई का भोग अर्पित कर श्रद्धालुओं ने सुख, समृद्धि और लोकमंगल का आशीर्वाद मांगा।
रथयात्रा को केवल धार्मिक उत्सव तक सीमित न रखते हुए इसे पर्यावरण संरक्षण के जनआंदोलन का स्वरूप भी दिया गया। श्रद्धालुओं के बीच भगवान जगन्नाथ के प्रिय तुलसी के पौधे और कपड़े के झोलों का वितरण किया गया तथा हजारों लोगों से सिंगल यूज पॉलीथिन का उपयोग छोड़ने की अपील की गई। रथ के आसपास स्वच्छता अभियान चलाकर यह संदेश दिया गया कि स्वच्छता केवल अभियान नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और संस्कार का अभिन्न हिस्सा है।
नमामि गंगे काशी क्षेत्र के संयोजक एवं नगर निगम के स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर राजेश शुक्ला ने कहा कि भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा भारतीय लोकजीवन में वर्षा, कृषि, वृक्षारोपण और प्रकृति के सम्मान की शाश्वत परंपरा का प्रतीक है। इन परंपराओं में पर्यावरण संरक्षण का वैज्ञानिक संदेश छिपा है, जिसे आज फिर समाज के बीच जीवंत करने की आवश्यकता है।
इस अवसर पर अन्नपूर्णा सामाजिक सेवा समिति की अध्यक्ष नीलिमा राय, रीता पटेल, गीता सचदेवा, गीता मिश्रा, सुशीला पाण्डेय, उषा सिंह, संध्या श्रीवास्तव, सुनैना शाहा, उषा वर्मा सहित अनेक सदस्य उपस्थित रहे। काशी की इस आध्यात्मिक बेला ने एक बार फिर यह एहसास कराया कि जब बाबा विश्वनाथ की नगरी में जगन्नाथ का रथ निकलता है, तब केवल देव विग्रह ही नहीं चलते, बल्कि आस्था, सेवा, स्वच्छता और प्रकृति संरक्षण का संदेश भी जन-जन तक पहुंचता है।
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