मेला का शुभारंभ मुख्य अतिथियों द्वारा पूजा-अर्चना के साथ प्रारम्भ हुआ, श्रद्धालुओं का भारी उत्साह दिखा

प्रभु के रथ पर सवार बाबा जगन्नाथ के दर्शन को उमड़ी भीड़ सुरक्षा एवं व्यवस्था में पुलिस के साथ समित के वालंटियरों की सराहनीय भूमिका रहा 

वाराणसी। काशी की पावन भूमि पर स्थित अतिप्राचीन शिवपुर क्षेत्र में रविवार 19 जुलाई 2026 को शिवपुर रथयात्रा मेला भक्ति और उल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। मेला समिति के तत्वावधान में आयोजित यह मेला पुरानी चूंगी पर शाम 5 बजे शुभारंभ हुआ। मेले के संरक्षक ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह ‘डीडी’ ने बताया कि मुख्य अतिथि शशिकांत राय उर्फ चुन्ना (वरिष्ठ अधिवक्ता एवं प्रमुख समाजसेवी) तथा विशिष्ट अतिथि रजनीश सिंह (अंतर्राष्ट्रीय बास्केटबॉल खिलाड़ी एवं समाजसेवी) की उपस्थिति में भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा एवं भाई बलभद्र की विधिवत पूजा-अर्चना, आरती एवं दीप प्रज्वलन कर मेले का उद्घाटन किया गया। सायंकाल 5 बजे से रात्रि 12 बजे तक चले इस मेले में हजारों श्रद्धालुओं ने रथ पर विराजमान भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र के दर्शन कर पुण्य प्राप्त किया। मेला परिसर में नानखटाई, चाट-पकौड़ी, मिठाई और खिलौनों की दुकानों पर खरीददारों की भारी भीड़ उमड़ी रही। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर वर्ग के लोग इस पावन अवसर का आनंद लेते दिखे। पूरा मेला क्षेत्र भक्ति भाव से सराबोर रहा।

मेला समिति ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पूरे परिसर में वालंटियर तैनात किए थे। थाना शिवपुर प्रभारी अजीत वर्मा के नेतृत्व में पुलिस बल ने भी सुरक्षा व्यवस्था संभाली। महिला एवं पुरुष पुलिस कर्मियों की संयुक्त टीमें लगातार भ्रमण करती रहीं, जिससे मेला पूरी तरह शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित रहा। मेले को सफल बनाने में शिवपुर रथयात्रा मेला समिति के पदाधिकारियों का विशेष योगदान रहा। समिति के अध्यक्ष रामश्री मौर्य, महामंत्री राजनाथ मौर्य, उपाध्यक्ष नारायण केशरी, राजेश, पवन सिंह, अशोक सिंह ‘मामा’, रोहित मौर्य, अनुलेश उपाध्याय, अनिल मौर्य, विजय सिंह, कोषाध्यक्ष गुलाब मौर्य, संतोष मिश्रा, सहित कई सदस्यों ने सक्रिय भूमिका निभाई। शिवपुर क्षेत्र के गणमान्य नागरिक भी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह ‘डीडी’ ने सभी अतिथियों, पुलिस प्रशासन, वालंटियरों और श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि भगवान जगन्नाथ की कृपा से मेला सकुशल सम्पन्न हुआ। यह मेला काशी की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक परंपरा को जीवंत रखने का एक सुंदर उदाहरण है।