डीसीपी वरुणा जोन ने रानू कुमार को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया, घंटों प्रदर्शन के बाद भी अधिकारी मौके पर नहीं पहुंची

सपा पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तथा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के ट्वीट के बाद अधिकारी मौके पर आए और मामले का संज्ञान लिया

वाराणसी। पांडेयपुर पुलिस चौकी में स्थानीय पत्रकार देवेंद्र पांडेय के साथ हुए अभद्र व्यवहार ने एक बार फिर पुलिस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना में आरोपी आरक्षी (सिपाही) रानू कुमार पर ‘गोली मार दूंगा’ जैसी खुली धमकी देने और पत्रकार की गाड़ी की चाबी व मोबाइल छीनने का आरोप है। कई घंटे चले प्रदर्शन के बावजूद कोई भी आला अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तथा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के ट्वीट के बाद ही अधिकारी मौके पर आए और मामले का संज्ञान लिया गया। घटना के अनुसार, पांडेयपुर पुलिस चौकी में पत्रकार देवेंद्र पांडेय से अभद्रता की गई। रोहनिया थाने तैनात पर सिपाही जो किसी मामलों को लेकर पांडेपुर चौकी पर आया था। सिपाही रानू कुमार ने पत्रकार की गाड़ी की चाबी और मोबाइल छीन लिया तथा धमकी भरे शब्दों का इस्तेमाल किया। घटना के बाद पत्रकारों ने लालपुर थाने के बाहर प्रदर्शन शुरू कर दिया। घंटों तक प्रदर्शन जारी रहा, लेकिन कोई भी आला अधिकारी अपना ऐसी का कमरा छोड़कर मौके पर नहीं पहुंचे। अर्धनग्न पत्रकारों की शिकायत सुनने के लिए भी कोई अधिकारी नहीं आया। इस रवैये ने पत्रकार समुदाय में आक्रोश पैदा कर दिया।

जब मामला सोशल मीडिया पर गरमाया और अजय राय ने ट्विटर पर ट्वीट कर संज्ञान लिया, तब एक अधिकारी मौके पर पहुंचे। आरोपी सिपाही को मेडिकल जांच के लिए भेजा गया। मेडिकल के दौरान भी रानू कुमार ने ‘गोली मार दूंगा’ की धमकी दी थी। मामले में तूल पकड़ने और चौतरफा घिरने के बाद डीसीपी वरुणा जोन ने आरोपी आरक्षी रानू कुमार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। पत्रकार समुदाय का कहना है कि सिपाही को निलंबित करके आला अधिकारी अपना पलड़ा झाड़ने का काम कर रहे हैं। पत्रकार की मान-सम्मान की बात कहाँ गई? आए दिन पुलिस द्वारा पत्रकारों के साथ ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं। पत्रकार देश का चौथा स्तंभ माने जाते हैं। वे अपनी रिपोर्टिंग मान-सम्मान के साथ करते हैं, लेकिन पुलिस का रवैया कब बदलेगा? वाराणसी के कई थाने-चौकियों में ऐसे सिपाही और दरोगा हैं जो पत्रकारों को अहमियत नहीं देते।

प्रश्न उठ रहा है कि शासन-प्रशासन इस पर कब कड़ी कार्रवाई करेगा? क्या केवल एक सिपाही को निलंबित करने से पुलिसिया हनक और पत्रकारों की भावनाओं से खेलने का सिलसिला थमेगा? घटना के बाद कई घंटे तक कोई अधिकारी मौके पर न पहुँचना और राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद ही संज्ञान लेना, पुलिस महकमे की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

पत्रकार संघ और स्थानीय पत्रकार समुदाय मांग कर रहे हैं कि सिर्फ निलंबन पर्याप्त नहीं है। दोषी सिपाही के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाए और संबंधित आला अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाए, ताकि भविष्य में पत्रकारों के साथ ऐसी अभद्रता दोबारा न हो।