दीपापुर के अधूरी योजनाओं, पारदर्शी व्यवस्था और जनसहयोग से गांव की नई तस्वीर गढ़ने का है विजन
वाराणसी। लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई ग्राम पंचायत में नेतृत्व का स्वरूप भले बदल गया हो, लेकिन गांव की अपेक्षाएं आज भी वही हैं—बेहतर सड़कें, मजबूत आधारभूत सुविधाएं, पारदर्शी व्यवस्था और समय पर विकास कार्य। ग्राम प्रधानों के कार्यकाल की समाप्ति के बाद जब ग्राम पंचायतों की बागडोर प्रशासकों के हाथों में आई तो प्रशासनिक व्यवस्था भी बदल गई।
अब विकास कार्यों की हर फाइल जिला मुख्यालय की चौखट तक पहुंचती है, जहां स्वीकृति की औपचारिकताएं तय करती हैं कि गांव में अगला काम कब शुरू होगा। ऐसे संक्रमण काल में विकास खंड आराजीलाइन की ग्राम पंचायत दीपापुर के प्रशासक संतोष कुमार से परफेक्ट मिशन ने विस्तार से बातचीत की। बातचीत में उन्होंने विकास की चुनौतियों, अधूरी योजनाओं, प्रशासनिक बदलाव और गांव के भविष्य को लेकर खुलकर अपनी बात रखी। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश-
प्रशासक की नई जिम्मेदारी, बढ़ी प्रक्रियाएं और धीमी हुई विकास की रफ्तार
संतोष कुमार मानते हैं कि ग्राम प्रधान के रूप में निर्णय लेने और कार्य शुरू कराने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल थी। पंचायत स्तर पर आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होते ही विकास कार्य गति पकड़ लेते थे। लेकिन प्रशासक बनने के बाद स्थिति बदल गई है। अब छोटे-से-छोटे कार्य की फाइल भी जिलाधिकारी कार्यालय से होकर गुजरती है। स्वाभाविक है कि प्रशासनिक प्रक्रिया जितनी लंबी होगी, विकास कार्यों में उतना ही समय लगेगा। हालांकि उनका कहना है कि यह व्यवस्था नियमों के अनुरूप है और उनका प्रयास रहेगा कि इन प्रक्रियाओं के बीच भी गांव के विकास की गति यथासंभव बनी रहे।
काम ही पहचान बना, मुख्यमंत्री पुरस्कार ने बढ़ाया विश्वास
अपने पिछले कार्यकाल का उल्लेख करते हुए संतोष कुमार आत्मविश्वास के साथ कहते हैं कि दीपापुर में अधिकांश आवश्यक विकास कार्य पूरे कराए जा चुके हैं। योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और गुणवत्तापूर्ण कार्यों के लिए उन्हें मुख्यमंत्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। यही सम्मान उनके लिए जिम्मेदारी भी है कि जो कार्य किसी कारणवश अधूरे रह गए हैं, उन्हें भी प्राथमिकता के साथ पूरा कराया जाए, ताकि गांव का विकास किसी भी स्तर पर अधूरा न रह जाए।
एक सड़क, जो विकास की राह में अब भी सबसे बड़ी बाधा
जब गांव की सबसे बड़ी समस्या की बात होती है तो संतोष कुमार बिना किसी संकोच के मुख्य सड़क का मुद्दा उठाते हैं। उनका कहना है कि गांव की बड़ी आबादी जिस मार्ग से आवागमन करती है, वह लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के अधीन है। पंचायत की इच्छा होने के बावजूद उस सड़क पर सीधे कार्य नहीं कराया जा सकता। यही कारण है कि यह समस्या वर्षों से बनी हुई है। उनका विश्वास है कि संबंधित विभाग के सहयोग से इस महत्वपूर्ण मार्ग का निर्माण या सुधार कराया गया तो दीपापुर के विकास को नई गति मिलेगी।
डिजिटल व्यवस्था ने पारदर्शिता को दी नई मजबूती
पंचायतों में योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर अक्सर पारदर्शिता पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन संतोष कुमार का मानना है कि वर्तमान समय में डिजिटल व्यवस्था ने इस स्थिति को काफी हद तक बदल दिया है। अधिकांश प्रक्रियाएं ऑनलाइन होने से प्रत्येक योजना और उसके लाभार्थियों का रिकॉर्ड सुरक्षित और सार्वजनिक है। इससे जवाबदेही बढ़ी है और पात्र लोगों तक योजनाओं का लाभ अधिक पारदर्शी तरीके से पहुंचाना संभव हुआ है। उनके अनुसार ईमानदार कार्यशैली और तकनीक का बेहतर उपयोग ही जनता का विश्वास मजबूत कर सकता है।
जनसहयोग से ही साकार होगा समृद्ध दीपापुर का सपना
बातचीत के अंत में संतोष कुमार का संदेश केवल अपील नहीं, बल्कि साझेदारी का आह्वान बनकर सामने आता है। उनका कहना है कि विकास केवल सरकारी योजनाओं से नहीं होता, बल्कि तब होता है जब पूरा गांव उसे अपना दायित्व मानकर सहयोग करे।
यदि लोग विकास कार्यों में अनावश्यक बाधाएं उत्पन्न करने के बजाय सकारात्मक सहभागिता निभाएं, तो सीमित संसाधनों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बावजूद दीपापुर को आदर्श ग्राम पंचायत बनाने का लक्ष्य अवश्य हासिल किया जा सकता है।
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