वाराणसी। उत्तर प्रदेश किसान कांग्रेस के पूर्व प्रदेश प्रवक्ता एवं उपाध्यक्ष संजय चौबे ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जेएसपी सुप्रीमो प्रशांत किशोर की जीत तथा मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर कांग्रेस की जीत ने राष्ट्रीय राजनीति में कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह मोदी और शाह के राजनीतिक युग में बदलाव का संकेत है?
यह सवाल केवल एक चुनाव की हार-जीत के कारण नहीं उठ रहा है। बांकीपुर विधानसभा सीट पर लगभग 30 वर्षों से भाजपा का वर्चस्व रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के पिता तथा बाद में स्वयं नितिन नवीन इस सीट का प्रतिनिधित्व करते रहे। लेकिन नितिन नवीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और राज्यसभा सदस्य बनने के बाद हुए उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत हुई। ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि इसके पीछे कौन-कौन से कारण रहे।
इस प्रश्न का उत्तर खोजने से पहले यह समझना होगा कि बांकीपुर सीट पर भाजपा इतने लंबे समय तक क्यों जीतती रही। इसके लिए 1989-90 के दौर को याद करना होगा, जब पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय विश्वनाथ प्रताप सिंह मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर रहे थे और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी रामजन्मभूमि आंदोलन के समर्थन में रथयात्रा निकाल रहे थे। उस समय मंडल आयोग के तहत 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के प्रस्ताव से सवर्ण समाज का एक बड़ा वर्ग आहत महसूस कर रहा था। दूसरी ओर धार्मिक मुद्दों के प्रति उसका झुकाव भी अधिक था। परिणामस्वरूप सवर्ण समाज का बड़ा हिस्सा कांग्रेस छोड़कर भाजपा के साथ जुड़ गया और यह राजनीतिक रुझान लंबे समय तक बना रहा।
यदि लगभग 3.78 लाख मतदाताओं वाली बांकीपुर विधानसभा के जातीय समीकरण पर दृष्टि डालें तो अनुमानतः कायस्थ 14 प्रतिशत, वैश्य 9 प्रतिशत, चंद्रवंशी 9 प्रतिशत, ब्राह्मण 7 प्रतिशत, राजपूत 5 प्रतिशत, भूमिहार 7 प्रतिशत, कुर्मी 5 प्रतिशत, यादव 12 प्रतिशत, दलित एवं महादलित 8 प्रतिशत, मुस्लिम 9 प्रतिशत तथा अन्य जातियों के मतदाता भी हैं। यदि केवल सवर्ण वर्ग को देखा जाए तो उनकी हिस्सेदारी लगभग 51 प्रतिशत बैठती है। यही कारण था कि भाजपा को इस सीट पर लगातार जीत मिलती रही।
किन्तु इस बार परिणाम अलग रहे। इसके पीछे हाल की कई घटनाओं को कारण के रूप में देखा जा रहा है। यूजीसी कानून, नीट पेपर लीक तथा भरत तिवारी एनकाउंटर प्रकरण जैसे मुद्दों से सवर्ण समाज के एक वर्ग में नाराजगी की चर्चा रही। कुछ मीडिया रिपोर्टों में इसे तथाकथित "Gen G आंदोलन" से भी जोड़कर देखा गया है। हालांकि बांकीपुर के सामाजिक ढांचे को देखते हुए केवल इसी आंदोलन को हार का प्रमुख कारण मानना उचित नहीं होगा।
मेरे मत में तत्काल प्रभाव डालने वाला सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा भरत तिवारी एनकाउंटर प्रकरण रहा। बताया जाता है कि भरत तिवारी ने बाढ़ पीड़ितों के लिए सहायता की मांग की थी और बाढ़ पीड़ितों में दलित एवं महादलित समाज के लोग भी बड़ी संख्या में थे। इस घटना के बाद विभिन्न वर्गों में नाराजगी बढ़ी और अनेक मतदाताओं ने भाजपा को सबक सिखाने का मन बनाया। दूसरी ओर, पारंपरिक विपक्षी दलों से भी मतदाताओं का एक वर्ग पूरी तरह संतुष्ट नहीं था। इसलिए भाजपा के विरोध में मतदान करने वाले अनेक मतदाता सीधे प्रशांत किशोर के पक्ष में चले गए और वे चुनाव जीत गए।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि भविष्य का चुनाव केवल प्रशांत किशोर बनाम भाजपा होगा। आगामी चुनाव में राजनीतिक परिस्थितियां बदल सकती हैं और सभी दलों के सामने अवसर मौजूद हैं। यदि यह माना जाए कि सवर्ण समाज भाजपा से नाराज है, तो इसका प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है, क्योंकि देश में इस वर्ग की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत मानी जाती है। यदि यह वर्ग बड़े पैमाने पर भाजपा से दूर जाता है तो पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
बिहार में भरत तिवारी प्रकरण के बाद विभिन्न वर्गों में नाराजगी की चर्चा रही। संभवतः यही कारण रहा कि बड़ी संख्या में मतदाताओं ने मतदान में उत्साह नहीं दिखाया और बांकीपुर में अपेक्षाकृत कम मतदान दर्ज हुआ। लोकतंत्र में चुनावों से किसी दल को लाभ तो किसी को हानि होती है। वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में राष्ट्रीय स्तर पर बने इस माहौल का लाभ कौन-सा दल उठाता है, इसका उत्तर आने वाला समय देगा। एक छोटी-सी राजनीतिक भूल भी पूरे माहौल को बदल सकती है। वर्तमान परिस्थितियों में कांग्रेस के सामने भाजपा से अपने पुराने मतदाताओं को पुनः जोड़ने का अवसर है, लेकिन इसके लिए उसे बूथ स्तर तक व्यापक संगठनात्मक मेहनत करनी होगी।
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