राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के मियावाकी वन में 300 से अधिक पौधे रोपे गए

प्रयागराज, । उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज के यमुना परिसर में रविवार को वृहद मियावाकी वन वृक्षारोपण अभियान का शुभारंभ किया गया। राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय की कुलाधिपति श्रीमती आनंदीबेन पटेल की प्रेरणा से आयोजित इस अभियान के तहत एक ही दिन में 300 से अधिक पौधे रोपे गए। कार्यक्रम का शुभारंभ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सत्यकाम एवं कुलसचिव कर्नल विनय कुमार ने चंदन का पौधा लगाकर किया।

विश्वविद्यालय की कृषि विज्ञान विद्या शाखा के तत्वावधान में आयोजित इस अभियान में चंदन, पीपल, नीम, जामुन, कटहल, आंवला, नींबू, करौंदा, अशोक, गुड़हल, शहतूत और आम सहित विभिन्न प्रजातियों के पौधों का रोपण किया गया। मियावाकी पद्धति से विकसित किए जा रहे इस वन का उद्देश्य कम स्थान में अधिक घनत्व वाले हरित क्षेत्र का निर्माण कर पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है।

इस अवसर पर कुलपति प्रो. सत्यकाम ने कहा कि वृक्ष धरती के वास्तविक आभूषण हैं और हरियाली ही स्वस्थ एवं समृद्ध जीवन की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि यदि धरती हरी-भरी रहेगी तो मानव जीवन भी सुरक्षित और खुशहाल रहेगा। उन्होंने सभी लोगों से अधिक से अधिक पौधे लगाने और उनकी देखभाल का संकल्प लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि पेड़ हमें ऑक्सीजन, स्वच्छ वायु, छाया और फल प्रदान करते हैं, साथ ही प्रदूषण को नियंत्रित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, जिसका सबसे प्रभावी और सरल समाधान व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण है।

कार्यक्रम में मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. दिलीप चौरसिया एवं उनकी पत्नी डॉ. विदुला दिलीप ने भी पीपल और नीम के पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। अभियान का संचालन कृषि विज्ञान विद्या शाखा के प्रभारी प्रो. संजय सिंह ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन सहायक आचार्य डॉ. प्रमोद कुमार ने दिया।

वृक्षारोपण अभियान में विश्वविद्यालय के पुरातन छात्र, वर्तमान छात्र, शोधार्थी, शिक्षक, चिकित्सक, अधिकारी एवं कर्मचारियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। सभी प्रतिभागियों ने पर्यावरण संरक्षण, हरित विकास और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ एवं सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने का संकल्प लिया। विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित यह अभियान पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।