प्रयागराज। गायत्री त्रिवेणी प्रयाग पीठाधीश्वर, अनंत श्री विभूषित आद्या जगतगुरु शंकराचार्य त्रिकाल भवन्ता सरस्वती जी ने एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान सनातन परंपरा में महिलाओं की भूमिका और धार्मिक पदों पर उनकी भागीदारी को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक ज्ञान और वेद-शास्त्र की दृष्टि से महिला और पुरुष दोनों समान हैं, इसलिए केवल पुरुषों को ही सर्वोच्च धार्मिक पदों तक सीमित रखना उचित नहीं है।
उन्होंने कई प्रसिद्ध कथा-वाचकों पर भी गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि आज अनेक कथावाचक केवल दिखावे और प्रचार-प्रसार के माध्यम से प्रसिद्धि प्राप्त कर रहे हैं, जबकि वेद और शास्त्रों का गहन ज्ञान ही किसी भी धर्माचार्य की वास्तविक पहचान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज को ऐसे व्यक्तियों से सावधान रहने की आवश्यकता है जो धर्म के नाम पर लोगों को भ्रमित करते हैं।
आद्या जगतगुरु शंकराचार्य ने प्रश्न उठाया कि जब सनातन धर्म में देवी शक्ति की पूजा की जाती है और महिलाओं को शक्ति स्वरूप माना जाता है, तब शंकराचार्य, पीठाधीश्वर या महामंडलेश्वर जैसे सर्वोच्च धार्मिक पदों पर महिलाओं को समान अवसर क्यों नहीं दिया जाता। उन्होंने कहा कि आज तक अधिकांश धार्मिक संस्थाओं में पुरुषों को ही प्राथमिकता दी जाती रही है, जबकि महिलाओं की आध्यात्मिक क्षमता किसी भी प्रकार से कम नहीं है।
उन्होंने कामाख्या माता, वैष्णो देवी सहित विभिन्न शक्तिपीठों का उल्लेख करते हुए कहा कि जहां देवी की आराधना होती है, वहां भी प्रशासनिक और धार्मिक नेतृत्व प्रायः पुरुषों के हाथों में रहता है। यह व्यवस्था समय के साथ पुनर्विचार की मांग करती है।
उन्होंने कहा कि शास्त्रों के अनुसार यदि किसी महिला के पास वेद, उपनिषद और आध्यात्मिक परंपराओं का गहन ज्ञान है तथा वह आवश्यक योग्यताओं को पूरा करती है, तो उसे भी शंकराचार्य या अन्य उच्च धार्मिक पदों के लिए पात्र माना जाना चाहिए। महिलाओं को केवल सेवा या सीमित भूमिकाओं तक बांधकर देखना उचित नहीं है।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि सनातन धर्म समानता, ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग दिखाता है। इसलिए धार्मिक संस्थाओं में भी योग्यता के आधार पर महिलाओं और पुरुषों को समान अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने समाज से इस विषय पर गंभीर चिंतन करने और महिलाओं के सम्मान एवं सहभागिता को बढ़ावा देने का आह्वान किया।
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