शिवपुर रामलीला की अनोखी परंपरा और भाव-भक्ति, सातवें दिन धनुष यज्ञ लीला का भव्य दृश्य, रामायणिया बंधु और सहयोगी कलाकारों की अहम भूमिका से होती है रामलीला 

वाराणसी। पावन नगरी काशी अध्यात्म और देवी-देवताओं की नगरी है। यहां बाबा विश्वनाथ सहित सभी देवी-देवता विराजमान हैं। इसी पावन भूमि पर सनातन परंपरा को जागृत रखने वाली रामकथा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस पर आधारित रामलीला का भावपूर्ण मंचन होता है। काशी में सैकड़ों जगहों पर रामलीला का आयोजन होता है, लेकिन सबसे प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला है और उसके बाद शिवपुर की रामलीला का विशेष स्थान है। शिवपुर की करीब 350 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक रामलीला का शुभारम्भ 25 सितंबर से हुआ है। यहां 33 दिनों तक रामलीला का मंचन द्वारा राम दरबार की लीला चलती है। शिवपुर की रामलीला की भाव-भक्ति और मंचन शैली सबसे अलग है। यहां पूरा मंचन रामचरितमानस की चौपाइयों पर ही आधारित होता है। हर चौपाई और हर छंद को रामलीला के रामायणिया बंधु भावपूर्ण स्वर में गाते हैं, उसके बाद ही दृश्य का मंचन होता है। इस अनोखी परंपरा के कारण शिवपुर की रामलीला दर्शकों के मन में गहरी छाप छोड़ती है और सनातन संस्कृति को जीवंत रखती है। परंपरा के अनुसार प्रमुख पात्रों की भूमिका ब्राह्मण बालकों द्वारा निभाई जा रही है। राम की भूमिका उज्ज्वल मिश्रा, लक्ष्मण की विक्रम चतुर्वेदी और सीता की भूमिका रजत मिश्रा निभा रहे हैं। मंचन में पात्रों की भूमिका अहम मानी जाती है। रामायणिया दोहा-छंद का गायन करते हैं और पात्र व्यास के बताने के अनुसार लीला करते हैं। यह शैली रामचरितमानस की मूल भावना को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करती है और भक्तों को अध्यात्म तथा भक्ति का गहरा अनुभव कराती है। 

शिवपुर रामलीला के सातवें दिन पावन धनुष यज्ञ लीला का मंचन हुआ। इस लीला में प्रभु श्रीराम ने जनकपुरी में रखे शिवधनुष को भंग कर माता सीता से स्वयंवर रचा। रामचरितमानस की चौपाइयों के गायन के साथ मंच पर यह दृश्य अत्यंत भव्य और भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया। दर्शकों ने देखा कि जब श्रीराम ने धनुष उठाया और उसे सहजता से तोड़ दिया, तब पूरे मंच और दर्शक दीर्घा में जय-जयकार गूंज उठी। माता सीता के स्वयंवर का यह पावन क्षण शिवपुर की रामलीला की सबसे आकर्षक लीलाओं में से एक माना जाता है। रामायणिया बंधुओं के मधुर गायन और कलाकारों के अभिनय ने पूरे दृश्य को और अधिक प्रभावशाली बना दिया। यह मंचन न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि भक्तों को रामकथा की दिव्य अनुभूति भी प्रदान करता है। मानस वाचन और मंचन में कई अनुभवी कलाकारों की महत्वपूर्ण भूमिका है। मुख्य रूप से भोला नाथ शर्मा, वंश नारायण, अनिल केशरी, रामबलि पाण्डेय, दीनानाथ सेठ (मृदंग वादक), नत्थू यादव, उज्जवल चौरसिया, चन्दन, जवाहिर लाल मौर्या, अनुराग मिश्र, सागर गोंड, बाबू केशरी, ब्यास उदय शंकर मिश्र, कोठारी संदीप शुक्ला, श्रृंगारिया राजेन्द्र सोनी आदि की अहम भागीदारी रहती है। इनकी समर्पित सेवा और भावपूर्ण प्रस्तुति के कारण शिवपुर की रामलीला काशी की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में जीवंत बनी हुई है। यह 33 दिनों तक चलने वाली लीला सनातन परंपरा को मजबूत करती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहती है।