वाराणसी। शरीर की बीमारी का उपचार केवल दवाओं तक सीमित नहीं, बल्कि मन, खानपान, व्यवहार और प्रकृति के साथ संतुलन भी स्वस्थ जीवन की बुनियाद है। इसी समग्र उपचार दृष्टि को केंद्र में रखते हुए सारनाथ स्थित केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के अतिश सभागार में शुक्रवार को तिब्बती चिकित्सा पद्धति ‘सोवा-रिग्पा’ पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। 11 और 12 सितंबर तक चलने वाली संगोष्ठी में देशभर के विशेषज्ञ तिब्बती चिकित्सा के सिद्धांत, परंपरा और नैदानिक अभ्यास पर मंथन कर रहे हैं।
केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सेंट्रल काउंसिल ऑफ तिब्बतन मेडिसिन और केंद्रीय तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन, धर्मशाला के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी का शुभारंभ तिब्बती आध्यात्मिक परंपरा और मंत्रोच्चारण के साथ हुआ।
मुख्य अतिथि केंद्रीय तिब्बतन प्रशासन, धर्मशाला के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. कॉलदेन पेमाछो ने कहा कि ‘सोवा-रिग्पा’ का अर्थ ‘उपचार का विज्ञान’ है। यह केवल औषधि देने की पद्धति नहीं, बल्कि शरीर, मन और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करने वाली समग्र चिकित्सा प्रणाली है। आयुर्वेद की तरह तिब्बती चिकित्सा में भी वायु, पित्त और कफ के संतुलन को महत्वपूर्ण माना जाता है।
उन्होंने कहा कि इस चिकित्सा परंपरा में हिमालयी क्षेत्र में मिलने वाली एक हजार से अधिक जड़ी-बूटियों, खनिजों और पारंपरिक औषधीय पदार्थों का उपयोग किया जाता है। इनमें केसर, अगरू, गुग्गुल, शिलाजीत सहित कई दुर्लभ हिमालयी वनस्पतियां शामिल हैं। उन्होंने तनाव, अनिद्रा, चिंता, पाचन संबंधी समस्याओं, गठिया, जोड़ों के दर्द, एलर्जी और श्वसन संबंधी परेशानियों सहित विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं के संदर्भ में सोवा-रिग्पा की उपयोगिता पर प्रकाश डाला।
डॉ. पेमाछो ने कहा कि तिब्बती चिकित्सा परंपरा मन और शरीर के संबंध को विशेष महत्व देती है। इसीलिए औषधियों के साथ ध्यान, योग, संतुलित खानपान और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव पर भी जोर दिया जाता है।
140 प्रतिभागी, 11 विशेषज्ञ प्रस्तुत करेंगे शोधपत्र
सेंट्रल काउंसिल ऑफ तिब्बतन मेडिसिन के अध्यक्ष डॉ. थुपतेन कुनफेल ने कहा कि सोवा-रिग्पा के चिकित्सकों और विद्यार्थियों के लिए यह चौथा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया है। इसमें देशभर के विद्वानों को चिकित्सा सिद्धांत और नैदानिक अभ्यास से जुड़े विषयों पर अपने अध्ययन प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया गया है।
उन्होंने कहा कि पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को आगे बढ़ाते हुए उसका लाभ अधिक से अधिक रोगियों तक पहुंचाना सम्मेलन का प्रमुख उद्देश्य है। दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में करीब 140 प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। देशभर से चयनित 11 विशेषज्ञ सोवा-रिग्पा चिकित्सा पद्धति पर अपने शोधपत्र प्रस्तुत करेंगे।
‘ग्युशी’ आज भी तिब्बती चिकित्सा की आधारशिला
मुख्य वक्ता पद्मश्री डॉ. पद्मा गुरुमित ने तिब्बती चिकित्सा के प्रामाणिक ग्रंथ ‘ग्युशी’ (चार तंत्र) के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यह तिब्बती चिकित्सा का मौलिक ग्रंथ है और आज भी चिकित्सकों की शिक्षा तथा चिकित्सा अभ्यास के केंद्र में है। इसमें मानव शरीर, रोग, निदान, आहार, आचार-व्यवहार और उपचार की समन्वित व्याख्या मिलती है।
अध्यक्षता करते हुए संस्थान के कुलपति प्रो. वांगचुक दोर्जे नेगी ने कहा कि तिब्बती चिकित्सा केवल एक प्राचीन परंपरा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और कल्याण की महत्वपूर्ण चिकित्सा विरासत है। इसके पारंपरिक ज्ञान और उपचार सिद्धांतों पर वैज्ञानिक विमर्श एवं अध्ययन को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
संगोष्ठी में अतिथियों और विशेषज्ञों को सम्मानित भी किया गया। स्वागत सोवा-रिग्पा विभाग के संकाय प्रमुख प्रो. दोर्जे दमदुल ने किया, जबकि विभागाध्यक्ष डॉ. टाशी दावा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
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