ब्राह्मण भारतीय संस्कृति और परंपरा का गहरा भाव माना जाता है। हिंदू शास्त्रों, वेदों, पुराणों और स्मृतियों में ब्राह्मण वर्ण को ज्ञान, आध्यात्मिकता, पूजा-पाठ, शिक्षा और नैतिक मार्गदर्शन का आधार माना गया है। देवी-देवता, राजा और समाज ब्राह्मण को सम्मान देते थे क्योंकि उनका कार्य यज्ञ, शिक्षा और सृष्टि के नियमों का संरक्षण था। सम्मान और उपयोग पूजा-पाठ, विवाह, श्राद्ध, जन्म-मृत्यु के संस्कारों में ब्राह्मणों को अभी भी बुलाया जाता है। लेकिन राजनीति में सत्ता के गलियारों में अक्सर उन्हें उपयोगी साधन के रूप में देखा जाता है, न कि समान भागीदार के रूप में यह विरोधाभास वाकई दुखद है।

कलयुग की राजनीति वोट बैंक, जातीय समीकरण और सत्ता की होड़ में हर वर्ग को कठपुतली बनाने की कोशिश होती है। ब्राह्मण भी इससे अछूते नहीं रहे। कई ब्राह्मण नेता, विद्वान और कार्यकर्ता सक्रिय हैं, लेकिन कुल मिलाकर ब्राह्मण समाज राजनीतिक रूप से संगठित और प्रभावशाली नहीं रह गया है जितना उसकी जनसंख्या, बौद्धिक क्षमता और ऐतिहासिक भूमिका के अनुरूप होना चाहिए। ब्राह्मण की आवश्यकता बड़े-छोटे कार्यों में अक्सर ब्राह्मणों की सलाह या उपस्थिति मांगी जाती है, लेकिन फैसले दूसरे लोग ले लेते हैं। ब्राह्मण केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रह सकते। शास्त्रों में भी ब्राह्मण का आदर्श “विद्या, विनय और तप” है। आज के समय में ज्ञान, शिक्षा, तकनीक, अर्थव्यवस्था और नैतिक नेतृत्व भी ब्राह्मण की जिम्मेदारी का हिस्सा बनना चाहिए।

जागरण और एकता सोए हुए ब्राह्मणों को जगाने की जरूरत है। लेकिन यह जागरण विरोध और द्वेष पर नहीं, बल्कि शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन, संगठन और योग्यता पर आधारित होना चाहिए। राजनीति में भागीदारी ब्राह्मण युवा राजनीति में सक्रिय हों स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक। लेकिन जाति के नाम पर वोट मांगने की बजाय विकास, शिक्षा, सुशासन और समग्र हिंदू/भारतीय हित के एजेंडे पर। सभी वर्णों का सम्मान शास्त्रीय व्यवस्था में ब्राह्मण सर्वोच्च था, लेकिन कर्म और गुण पर आधारित। आज संविधान और लोकतंत्र सबको समान अवसर देता है। ब्राह्मणों को अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता को साबित करना होगा, न कि केवल जन्म पर निर्भर रहना। समस्या का मूल राजनीति में हर जाति का शोषण होता है। ब्राह्मणों के अलावा कई अन्य समुदाय भी “कठपुतली” बनाए जाते हैं। समाधान सभी सजग नागरिकों का संगठित होना है, न कि केवल एक वर्ण का। ब्राह्मण सृष्टि का आधार है यह सांस्कृतिक सत्य है। लेकिन सृष्टि अब बहुत जटिल हो गई है। अगर ब्राह्मण ज्ञान और नैतिकता का प्रकाश बनकर उभरेगा, तो राजनीति भी उसका सम्मान करने पर मजबूर होगी।